नया साल


हर बर्ष ऐसा ही तो होता …
निर्जीव सा शरीर पड़ा रहता है और आत्मा उससे अलग हो … उसे देखती रहती है …
मुड मुड कर देखती है और फिर चल देती है …
वही आत्मा फिर नए वर्ष में प्रवेश करती है …
नया वर्ष ऐसे ही आता है … पुराना ऐसे ही बीत जाता है …
पुराने पन्ने शिला पुस्तकों से हो जाते हैं … सख्त, कठोर जिसमे बहते से लम्हे विकल कर जाते है …
हम बिछड़े सभी बारी बारी बना रहे थे … चित्रों यानी स्केचिस की एक श्रृंखला … …कुछ स्वाभाविक और कुछ विचित्र सा … एक सूत्र में जोड़ रहे थे … याँ यूं कहे कि ला ला कर पटक रहे थे सब … ऐसे कि उन्हें अपने अनुसार पिरो अपनी कहानी बनाई सके …
और फिर जोड़ कर एक और किस्सा कहा जा सके …
शायद इस उम्मीद से रेशा रेशा उधेड़ डाला था … पुरानी उन के नए स्वेटर बनेंगे …
समय बदल गया है …
कबीर जी की तरह अब कौन बुनता है सब … कहाँ से लाएं कबीर अब …
( कोहरे में उगता दिन )
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