क्षितिज की रेखा पर  छोड़ दिया था तुम्हें उस दिन …

आने को कहा था और यहाँ  भटक गए थे …  तुम वहीं खडी होगी … सब कुछ इंतज़ार के रंग में रंग गया होगा …

क्या ब भी उन्ही कपड़ों में हो … कुछ खाया , पिया … !

हमें पता है तुम्हारी किसी ने सुध नहीं ली होगी … बीते हुओं की कोई सुध नहीं लेता … बीते हुओं के दर्द कैसे होते हैं … ?

और वो जो होते भी नहीं हैं और बीतते भी नहीं हैं , … उनके दर्द कैसे होते हैं … अब  तुम्हारे पास आ तुम जैसे ही  हो जायेंगे फिर से  …

यहाँ तो बिना ठिकाने के लोग प्लास्टिक की खिची रस्सियों से हो जाते है … बिगड़े रूप … बिगड़े आकार …

तेज धूल भरी हवाओं में लावारिस रद्दी कागजों के अनाथ  टुकड़े …

तुम क्या गयीं … हमें किसी ने नहीं संभाला … किसी ने नहीं सहेजा … मतलबी रिश्तों मे लुटते रहे …

विश्वास दिलाते हैं … हम वैसे ही बने रहे जैसा तुमने आखिरी बार देखा था …मन वैसे ही हैं जैसा तुमने बनाया था …

( तुम्हें लिखा एक पुराना खत )

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