जनवरी, 2012 के लिए पुरालेख

हमने जाना …

Posted in Uncategorized on जनवरी 23, 2012 by paawas

 

राहों पर रुक रुक रुक कर देखा …

रुक रुक कर कर ही सुनी तुम्हारी सभी आवाजें …

रुक रुक कर ढूँढा पाया जाना है तुझको …

रुक रुक कर ऐसे ही बस इतना जाना है …

 तुझ से होना तेरा होना बस हो जाना ही जीना है

निजी …

Posted in Uncategorized on जनवरी 23, 2012 by paawas

‘… आम की डाल पर डला झूला धीरे धीरे हिल रहा है अब … कुछ पल  पहले ही तो आप झूल रहे थे और देख रहे थे हम … आप किसी के साथ चले गए तो बच गयी है एक कहानी … झूलती सी … इस हवा में … बारिशों में भीगती यह कहानी सदियों तक बनी रहेगी … डोलती रहेगी … आप से लंबी हैं आप की कहानियां …’

आप से शुरू हो कर आप तक ही पहुंचें जो … ऐसी ही कुछ  बातें …

सूरज का हाथ थामे

थीं  गा रही हवाएं

पीछे ही आ रही थीं

काली भरी घटाएं

कुछ बात ही ऐसी थी

कुछ ऐसा ही हुआ था

बहते हुए वो आंसू

पलकों में लौट आये

आँखें तुम्हारी फिर से

तब बंद हो रही थीं

वो मौत का तबस्सुम

तुम काश देख पाते

बातें वो सुरमई सी

किस्से वो पीले पीले

हम से ही सब शुरू हो

हम तक ही लौटते हैं

कुछ देर को नज़ारे

हैरान हो गए थे

कुछ देर तक तुम्हारी

आवाज़ खो गयी थी

इक बार चलते चलते

जो मुड के देख लेते

वो सूखते से लम्हे

शायद संवरने लगते

बीती हुई बातों की

इतनी सी कहानी है

पलकों में लरजता सा

सूखा हुआ पानी है

बौछार पड गयी थी

लिखे हुए किस्सों पर

कुछ रंग धुल गए थे

आवाज़ रो रही थी

जितने भी दर्द आये

जैसे भी दर्द आये

एक वो पुराना चेहरा

दिखता रहा हमेशा

तू , सिर्फ तू …

Posted in Uncategorized on जनवरी 21, 2012 by paawas

जब झील के तले तू
खामोश सो रहा था
नज़रों ने मेरे दिल की
बाँधा था खुद को तुझ से
एक बार सामने आ
बादल की ओट से तू
देखूँ तो  फिर जुदाई
किस तरह सताती है
तुम जो भी मुझ से कहना
बस इस तरह से कहना
बह बह के पहाड़ों की
बर्फें पिघलती आयें
नदियों को मैंने रोका
बादल से मैंने पूछा
यादों की खुशबुओं का
ये कौन सा जहां है
तुम इसको देख कर के
हैराँ ज़रा न होना
उसकी है ये करामत
ज़र्रे में आसमा है
वो सच्ची मुहब्बत थी
वो सच्ची इबादत थी
खुद रब को खड़ा मैंने
आंसू बहाते देखा
चाहूँ तो सिर्फ इतना
मांगूं तो सिर्फ ये ही
मुझ को दिला दे दिल तू
बस उस जुलाहे जैसा
जो बंद करू आखें
इक तू ही नज़र आये
खोलूं जो अपनी पलकें
तेरा ही नज़ारा हो
तू मत बुलाना मुझको
तू बस भूलाना मझको
तेरी ही आरजू में
दीवाना हो रहूँगा
इक बार जो आ जाए
क़दमों को चूम लूं मैं
फिर किस तरह से देखूं
उठते हैं पाँव तेरे

ताजगी के पैरहन

Posted in Uncategorized on जनवरी 20, 2012 by paawas

टूटी हुई बातों को भूले हुए किस्सों को

तुम क्या करोगे कहके हम क्या करेंगे सुन के

छोटे से बुलबुले से
तुम सामने आओगे
फिर साथ में रहोगे
और साथ ही चलोगे
बीतेगा जब दिसंबर
बर्फें गिरेंगी ऊपर
 पीली हुई यादों के
तुम ढेर लगाओगे
पीली हुई यादों को …
तुम रोज बहाओगे
सदियों से तुमने अब तक
ऐसा ही तो किया है
बुझते हुए दिसंबर के
एक बुलबुले हो

तुम्हारे हम

Posted in Uncategorized on जनवरी 20, 2012 by paawas

करीं थीं बंद कस के , हमने अपनी मुठियाँ फिर भी
नहीं कुछ भी रहा बचकर ,
हमारे हाथ खाली हैं
फिसलता वक्त ,
दिन की धूप और न साये ही यादों के
वो खुशबू चांदनी की और लहरों की रवानी भी
कडकती बिजलियाँ , बूँदें , तुम्हारी सोच , वो सपने
सरकती रेत हो या अक्स हो बीते जहानो का
सभी तो रिस्ते रिस्ते बह गया है , खो गया देखो
नहीं करना था कुछ भी बंद , न ही कैद रखना था …
अगर आजाद रखते उस को जिंदा पास में अपने
हमारा ही बना रहता हमारा वो जहाँ अपना
(एक कविता नए कपड़ों में … पहचाना इसे)

क्या हो तुम

Posted in Uncategorized on जनवरी 20, 2012 by paawas

 

खिड़की खोली तो यह देखा

ख़्वाबों कीं बातों की भीड़ें एक हुई हैं

शोर बहुत है

कई तरह की बहस खुली है इन भीड़ों में

कोई कहता है बातों के ख्वाब सजे हैं

और कोई कहता है ये तो ख्वावों की बातें हैं सारी

तभी अचानक मन होता है

तुम को रोकूं चेहरा अपनी ओर घुमा कर

तुम से पूछूं

तुम क्या हो …

बातों की हो ख्वाब हमारी या ख़्वाबों की लंबी बातें …

तुम क्या हो, क्या नहीं कहोगी …

शुरू करें

Posted in Uncategorized on जनवरी 20, 2012 by paawas

कुछ पुराना पढ़ने की इच्छा जगती है … चंदामामा और मनमोहन के दिन , स्पोर्ट्स एंड पास्टाइम की कतरने , सिंदबाद और गुलीवर की कहानियां ,पिक्विक पेपर्स और रोबिंसन क्रूसो , मोटी सी जिल्द वाली चंद्रकांता ,रूप और बसंत … पैरों में गड़ते कंकर सा सब कुछ … एक बार फिर पढेंगे … एक स्केच बनाया करते थे … बहती नदी के किनारे एक सीधा सादा सा मकान . एक ‘बचपन’ की नदी , स्कर्ट पहने हाथों में फूल थामे दूर जाती नाव …को देखती एक रुआंसी सी लड़की जिसकी स्कर्ट उसकी टांगों से चिपक गयी है ,एक हरा सा पेड़ , ऊंची उग आई हरी हरी घास जिसे हवा ने एक ओर झुका दिया है … उस लड़की को रुकने को कह हम यहाँ आ गए थे … वह आज भी वहीं खडी है , वैसे ही … उसके बालों का क्लिप ढीला होकर गिरने वाला है … हमने कहा था पर उसने ठीक नहीं किया उस क्लिप को … आइये उस लड़की को चौंकाते हैं … पता नहीं पहचानेगी भी या नहीं …
हमें उस लड़की के सुनहरे बाल अच्छे लगते थे … शायद रंग वाली दातुन से उसके ओंठ ज्यादा गुलाबी लगते थे … शायद उसकी आँखें हरी थीं … शायद वो अपनी आँखों का रंग बदलती रहती थी …शायद स्कोटलैंड की हवाओं की आवाज़ के साथ वह कोई विदाई गीत गाती थी … इतने बरसों बाद भी बिदाई की घडी और उसका वह गीत रुका नही  है …