दिसम्बर, 2011 के लिए पुरालेख

तेरी बातें

Posted in Uncategorized on दिसम्बर 23, 2011 by paawas

हम ने रोका था हवाओं को सुनके बात तेरी
उनके पंखों में छुपा दी थी अनकही बातें
और कुछ खाली खाली वक्फे रख दिए थे वहाँ

तुमने हैरान से होकर के उतारा था उन्हें
और कुछ रंग , इक आवाज़ जोड़ डाली थीं
और आज़ाद उड़ा डाला था तितली की तरह

तुम कभी ध्यान से जो कान लगा बैठोगे
एक मासूम सी धीमी सी सदा आएगी
अनकही बातों का जादू तुम्हें आ घेरेगा

 बात कुछ दिन की है
चुपके से कान में तेरे
राज़ गहरा सा उडेला था हमने धीरे से

बातें कानो की वो छू आई है खुदाई को
और अंगडाई सी लेकर के सबा जागी है
अब तो हर रंग बदल जाएगा ज़माने का

  


ताजगी के पैरहन

Posted in Uncategorized on दिसम्बर 13, 2011 by paawas

हम कई बार उस चाय वाले के ‘रेहडी स्टाल’ पे चाय पीते है … हम डबल चाय पीते हैं … क्यूंकि आपको चाय पिलाना अच्छा लगता है … हम वहाँ अकेले कभी नहीं जाते … एक पहचान सी उगने लगी है उस चाय वाले से  … कई बार सोचते हैं … हमारे बाद , आप , क्या कभी वहाँ चाय पीने जाएँगे … शायद नहीं … शायद पहचान की आयु उसके बाद खत्म हो जायेगी … आप हमारे साथ चाय पियें … हमेशा हमारे साथ चाय पियें … यह एक पुरानी , धुंधली , पर न मिट सकने वाली  तमन्ना है … एक पुराना स्केच है , जिसे चित्र बना रहे हैं …

हम सड़क किनारे के बेंचों और् पेड़ों से बातें करते है … गुलमोहरों पर बातों से निशान लगाते है … काफी के कप में से काफी पी उसे बातों से भर देते हैं … बाते जो दुबारा काफी पीते समय अपना स्वाद बनाये रखती हैं और उन्हें कभी उन कपों से हटाया नहीं जा सकता … हर घूँट में पुरानी बातें मिली होती हैं और नई चर्चाओं का आधार बन जाती हैं …

हम तस्वीरें भी लेते है … सैंकडों तस्वीरें … जो बीतते लम्हों को स्वरूप देती हैं … जुदा जुदा से स्वरूप … उन्हें ‘यादें बनाती है … उन्हें चेहरे , और पहचान देती हैं … उन्हें देती हैं … धडकने जिनमें हम होते है , और हमारी तड़प जिसमे हमारे अवशेष होते है … कुछ पल ऐसे भी हो जाते हैं जैसे आप हो … और हर वो लम्हा जो ‘आप’ जैसा बन जाता है , खुद को खुशकिस्मत समझता है … अमरत्व पा लेता है … आपको पता है  वक्त निरंतर अमर बनता रहता हैं …
भोर में झील पे ठहरी , ऊंघती सी किश्तियाँ अपने अनदेखे से आँचल में आवाज़ो की गूँज समेट रही होती है … दूर की किसी डल और किसी नैनीताल को खींच खींच लाती हैं … बादल जैसे सहम सहम जाते है … सारी की सारी बूँदें फैक आस पास घिरी खूबसूरती को समेटने को आतुर हो उठते हैं … पर अपने धर्म याद कर आगे बढ़ जाते है … दिल बैठ जाता है उनका …
उस रोज वह बता रहा था … इधर देखता मोटर साइकिल चला रहा था … टक्कर हुई और घायल हो गया …
आपको नहीं पता … बिलकुल नहीं पता , कि क्या होता रहता है इस शहर में …

ताजगी के पैरहन

Posted in Uncategorized on दिसम्बर 13, 2011 by paawas



सुबह साढ़े छ: बजे सड़कें लगभग खाली होती हैं … उनके घुमावदार जिस्म पसरे रहते हैं … सलेटी रंग के अर्थहीन आकार … ऊंघती सी प्राइवेट बसें ‘स्मार्ट’ सी स्कूल बसों के समक्ष फीकी और बीमार लगती हैं … रात की नींद के बाद अधजगे से चेहरे उठ दुकानों के शटर खोलने लगते हैं … किसी नशे में धुत्त हो जैसे …
उजाला , सी एफ एल जैसा उजला जैसे किसी का अनीमिक चेहरा हो … पीली सूरज की रौशनी के छा जाने में अभी समय होता है … स्कूल जाने को तैयार हुए बच्चे सड़क के किनारे ‘रुके से’ खड़े रहते हैं … म्यूनिसिपलटी की सफाईवालियाँ , सड़कों को झाडूओं से छुआती , एक सिरे से दूसरे तक जा , गायब हो जाती हैं …
कहीं कहीं , छोटी छोटी आग जलती रहती है और उसका धुंआ एक लावारिस बच्चा बना … खामोश चिल्लाता रहता है … धुल कर साफ़ से लगते पुजारी मंदिरों में डोलते रहते हैं और चार्ली चेप्लिन की किसी फिल्म के किरदार जैसे महसूस होते है … सड़क किनारे हनुमान जी के छोटे से मंदिर में न जाने कौन जला जाता है एक दिया , जो काफी समय तक जलता रहता है … बस स्टाप की बेंच पर बैठे तीन बुज़ुर्ग अपने अपने अतीत संभाले , बार बार , वही बातें दोहराते रहते हैं … उनके चेहरे गाँव के बूढ़े , अशक्त , मोटे कांच के चश्मे वाले डाकिये के चेरे जैसे लगते है …
हमें , यहाँ जो स्टोर है , उसी के सामने आना होता है … आप् यही मिलते हैं हमें … आपके आने से पहले हम यहाँ आक्रर इन दृश्यों को , झाड पोंछ के , सजाने लगते हैं … आप के स्वागत की तैयारी ऐसे ही होती हैं … हम अक्सर फोन पर बता देते है कि ‘हम तैयार है’ … कि ‘आप आ जाइए’ … आपका पौने सात बजे पहुँचना हमे अवसर देता है कि हमारा मन भी तैयार हो जाए , हम उन भावनाओं के लिये स्थान बना लें जो , किसी की साडी ,  हेअर स्टाइल और  हलके से मेक अप को देख हमारे मन में आने वाली होती हैं … और जिन्हें हमने एक खुशनुमां से सरप्राइज़ से भर , आपके सामने रखना होता है … यह हर बार होता है , और , हर बार , आप हमें नए नए मिलते हो …
हम एक नई ताजगी से घिरे रहते है … बाते भी ताज़ा होती हैं , बनी – ठनी लगती हैं … और उम्मीदों की खुशबुएँ फैल रही होती हैं … ताजगी ताज़ा रजनीगन्धा के फूलों जैसी लगती है …
भला इस से अच्छी दिन की शुरुआत क्या हो सकती है …

तुम याद आते हो

Posted in Uncategorized on दिसम्बर 12, 2011 by paawas

“Love does not dominate; it cultivates”. Goethe

बीतती रात के आगाज़ के ख़्वाबों का धुंआ
देर तक अटका सा रहता है सुबह होने पर
और दिन सारा ये सिल जाता है उस रात के साथ
साल दर साल से फेहराते है यादों में मेरे
जिनकी हर भोर गई रात से नत्थी होकर
इक बही के किसी पन्ने सी लगा करती है        


आपकी बातें आप से करें

Posted in Uncategorized on दिसम्बर 10, 2011 by paawas



इस बार भी , हर वर्ष की तरह  , लिफाफों को खोला और मुड़े हुए कागज़ की तरह बंद बातों की तहें खोलीं … सारी बातों को टेबल पर औंधा पलटा … कुछ को ड्राई क्लीनर को दिया …और कुछ को रफूगर को दे दिया … कुछ इतनी पुरानी हो गयीं कि … उन्हें कम्बल बनाने वाले को दे दिया … इन बातों को उधेड़ वह , कई इधर उधर से इकठी की गई बातों में मिला देगा , और पुरानी बातों के नए डिजाइन के कम्बल और शाल बना लाएगा … इस रीप्रोसेसिंग के बाद भी हम  आपकी बातों को पकड़ लिया करेंगे …

अक्सर रात में आपकी बातें अपने ठन्डे हाथों से हमारे चेहरे को छूने लगती हैं … हमारे पुलओवर को बेध सिहरा सिहरा जाती हैं … आप पास खड़े मुस्कुराती रहती हैं … ‘ आया मज़ा ‘ और जैसे दूर नीहारिकाओं की छुअन लिये एक स्निग्ध सा एहसास जागने लगे … मन होता है किसी अंतरिक्श यान में बैठ आपकी सीमाओं को छू आयें …

हमने आपकी , जंगलों की खुशबू हुई , बातों को पह्चाना है … किसी पुराने स्वेटर को छूते हैं तो गए वर्ष की बातों के अनेक स्पर्श लहलहाने लगते हैं , गाने लगते हैं … अचानक आपकी कोई चिपकी हुई बात आँखों के आगे आ मुस्कुराने लगती है … पुराने और नए शेरो में से झांकती आपकी मुस्कुराती आँखें रास्ते रोकने लगती हैं … रात में तारों की लोरियाँ हो जाती हैं , तो भोर में पहाड़ों पे मंदिरों के शिखर से उठती , चांदी की घंटियों की , नींदों से जगाती गूँज … आप कहाँ कहाँ होती हैं … और … आप कहाँ नहीं होती हैं … आपको क्यों ढूँढें … क्योंकि आप तो हर ओर हैं … आप को क्यों न ढूँढें … क्योंकि आप तो भरमाती रहती हैं …

आप के होने और न होने के एहसास किसी सार्थकता की ओर इंगित करते हैं …

आपकी , बातों की ये बातें , आप ही से कर रहे हैं … सुन रही हैं न …

दूसरी पारी

Posted in Uncategorized on दिसम्बर 6, 2011 by paawas

सर्दियों की जमा देने वाली रातों में कई बार नींद उचट जाती …खिडकी के कांच पर कोहरे की मोटी परत जम् जाती … अँधेरा , घना कोहरा उतर आता बाहर … पहरेदार सा स्ट्रीट लाईट का खम्बा … डिफ्यूजड सा निरीह , पीला आलोक बिखेरता रहता … ऊंघता सा चौकन्नापन बंद दरवाजों पर खडा रहता …
हम छत को देखते रहते … हमें लगता छत की भी नींद उचट गयी है … उससे रमी खेलने को कहने का मन होता … हम उठते … चाय बनाते छत को फिर देखते पर वह कभी हमारे साथ चाय नहीं पीती … जब तुम होतीं तो तुम्हारे सुकून से भरे धेहरे के अलावा कुछ नज़र नहीं आता था … सोने से पूर्व जो तकिया और रजाई ठंडे हुए सिहराते … एक कुंकुनाती गर्माहट में लपेटे रहते … हमारा मन होता तुम्हें जगाएं … कहें … ‘ उठो , देखो हम जग रहे हैं …हमारे साथ चाय् पियो …’ चेहरे पर छाया मासूम सा सुकून हमें रोकता रहता … हम तुम्हारी रजाई को छू भी नहीं पाते … कहीं तुम उठ न बैठो … तुम अचानक करवट लेतीं तो हम सहम जाते … कोशिश करते कि हमारी नज़रें भी तुम्हें जोर से ना छुएँ … तुम्हारे माथे को चूम लेने की तड़प से जूझते रहते … हमें लगातार लड़ते रहना पड़ता …
जब तुम पास नहीं होती तो कई बार तुम्हारा फोन आता … तुम कुछ याद दिला सो जातीं और हम देर तक जागते रहते … कुछ सोचते … लिखते और कोइ पुराना सा पत्र पढते … तुम्हारी तस्वीरें देखते रहते …
हमें याद हो आता … वे भी तो ऐसे ही सोया करतीं थीं … हमारा हाथ पकडे रहती और बेखबर सोई रहतीं … तुम सब क्या एक जैसी ही होती हो … फिर सोचते ‘ नहीं , तुम उनके जैसी नहीं हो … वे तो बिलकुल अलग हैं … दूसरी हैं … और तुम भी तो उनसे अलग हो … थोड़ी थोड़ी …’ हम तुम में और उनमे कुछ भी मिलता जुलता नहीं पाते … हमने लिखा भी था … शायद तुमने पढ़ा नहीं था … बहुत सी बातें जिनमे हम थे तुम नहीं पढ़ पाई थीं … हम जिद भी तो नहीं कर सकते थे …
हम कई बार बैठे रहते और भोर हो जाती … बिट्टो आती … हमें जगा हुआ पाती … हमारे ठन्डे पैरों  को महसूस करती … ‘आप सोये नहीं , छुट्टी ले लेंगे तो आराम मिलेगा … खुद चाय बना ली … हमें कह् देते’ … ‘अरे कुछ नहीं ,नींद नहीं आयी तो सोचा कुछ काम निबटा लेते हैं’… वह कुछ समय तक हमारे सामने कालीन पर बैठ चाय पीती रहती और फिर चली जाती … कोहरा काले से सफ़ेद होने लगता …
हमें लगता जाड़ों में छोटे छोटे लम्हे अपनी तरलता खो शिलाओं कि तरह ठोस हो जाते थे … हमें वो यूरोप के सैनिकों की तरह लगते जो खामोश मार्च करते रहते और उनके भारी बूटों की आवाज़ जमी हुई हवाओं को काट काट कर हम तक पहुँचती रहती …
हम बिटिया के कमरे में जाते … उसे छूते वह अपनी छोटी छोटी बाहों से हमारी गर्दन घेर लेती … मुस्कुराती … ‘बहुत सर्दी है न पापा’ कह फिर सो जाती … हम अपने बेटे को भी नहीं जगा पाते … ‘ दीदी भी तो सो रही है’ … ‘हम जगा देंगे … आप तैयार हो जाइए’ … बिट्टो कहती …
यादें जैसे लंबी सुरंगों की हवाओं सी हो जाती … क्या परिचित और अपरिचित दोनों हमारी स्मृतियों में चाय के कप में शक्कर की तरह घुलते जा रहे थे … घुलने के बाद भी इनकी पहचान कैसे बनी रहती हैं … क्या हकीकत और यादें केवल दो कमरों की तरह हैं जिनमे आना जाना लगा रहता है …
ज़रा देखिये , हम कहाँ भटक रहें हैं … हमें तो जीत सिंह की बात करनी थी … ओह हो …     
         


तुम्हें देखू बस

Posted in Uncategorized on दिसम्बर 2, 2011 by paawas

एक बात सुनेंगी … पुरानी बात है … बस याद आ गयी … वैसे ही जैसे वो गीत याद आता है …’याद आ गयी वो नशीली निगाहें’ … तो बात यूं है कि … ‘


तेरी गज़ल को सुनाएं जो सांझ का तारा
धीरे धीरे से सिमट जाए रौशनी दिन की
रात हौले से कदम रखती हुई आ जाए
धीमी धीमी सी हवाओं में ज़ुल्फ उड़ने लगे
चंद खिलता हुआ आँखों में मुस्कुराने लगे
ताजगी झूमती घिर आये जो निशातों से

मैं तुझे देखूं तुझे देखूं बस तुझे देखूं
रोक कर कायनात की भटकती साँसों को
मैं तुझे देखूं तुझे देखूं बस तुझे देखू