नवम्बर, 2011 के लिए पुरालेख

नानी के पैसे

Posted in Uncategorized on नवम्बर 29, 2011 by paawas

उस रोज फोन किया था
देर तक बज घंटी खामोश हो गयी थी
बुझती उम्मीद के , कमज़ोर हथेली पे थमे रिश्ते
उछल कर फर्श पर जा पड़े थे
कहीं कोई चोट नहीं
बुझे हुए रिश्ते को चोट नहीं लगती
उम्मीद के साथ ही लिपस्टिक भी फीकी पद गयी थी
पक्षी उड़ते उड़ते पेड़ पर आ बैठे थे
सांझ सहम कर पीछे मुड के देख रही थी
वक्त सब पीछे छोड़ … आगे पढ़ रहा था
कमरा अँधेरा पड़ा था … कोई उलझन घेर रही थी उसे 
कैसे होते हैं कीचड उलझनों के
कीच जीवन भर साथ चलती है
धुल नहीं पाती
मरे सम्बन्ध साथ चलते हैं
कब्रों में दफ्न टूटी उम्मीदें
जिंदा रहती है
और कोई हमेशा के लिए दो शब्द कह
रास्ते बदल लेता है
मेरी नानी के गाँठ बंधे पैसे ऐसे ही खो जाया करते थे
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दूसरी पारी

Posted in Uncategorized on नवम्बर 29, 2011 by paawas

जालंधर के बाज़ारों में एक बाजार है … रैनक बाजार … सीधी , फिर टेढी और फिर एकाएक घूम जाती सी एक तंग सड़क जिसके दोनों ओर दुकाने हैं … दुकाने ऐसी कि जिनका ज़िक्र पुराने दस्तावेजों में मिल जाए … बंटवारे के पहले के कागजों में इनकी बातें लिखीं हैं … उनमे बैठे आज के दुकानदार अपने पुराने किस्सों से अचंभित और भौंचक्के रह जाते हैं … बताओ तो सुनते है और कहते हैं ‘अच्छा’ … कुछ इमारतें ठीक वैसी ही है जैसी चालीस के दशक में रहीं होंगी … आज भी इक्का दुकाने हैं जो बदलते समय को लेकर दुखी और पीड़ित हैं … भरे बाजार के शोर को अलग कर सकें तो आज भी अदृश्य आवाजें जो साठ के दशक की हैं … कानों में उतरने लगती हैं … और साठ के  दशक से चालीस के दशक के दिन  इतनी दूर नहीं थे … त्रासदियों के गवाह चेहरे ज़ख्मों को सहलाते दिख जाया करते थे … बर्बादियों और विस्थापन की आवाजें  सुनाई देतीं थीं … इतिहास के पृष्ठ चलते फिरते नज़र आते थे … हमें हमेशा उन लोगों की , याद रखने की तड़प पर अचरज होता था … हमने ऐसे घर देखे थे जिनमे दर्दों के सबूत चीखते से महसूस होते … जालंधर में पुराने के लिए आदर साफ़ दिखता था … फेहराती सफ़ेद घनी दाढ़ी वाले बुज़ुर्ग … बड़े से फैले दालानो में पीढ़ी पर बैठी सफ़ेद सन से बालों वाली कमज़ोर पर चमक से भरी आँखे लिए वात्सल्य लुटाती महिलायें … जिन्हें लोग आज भी बीजी बुलाते हैं … बुजुर्गियत की गरिमाओं में लिपटी और नई पीढ़ी पर प्यार बरसाती नज़र आती थीं … बच्चे गाडियां रोक सड़क पर उनके पाँव छूते और आशीर्वाद बटोरते … जालंधर गरिमाओं और मर्यादाओं में लिप्त शहर था … मिलाप और केसरी को ट्रीबियून अपेक्षा अधिक विश्वास मिलता था …
हम कालेजों और स्कूलों में भी घूमते रहते … अपने कालेज की दीवारों को छू के देखते … खाली लेक्चर हाल में जाते … लंबी लंबी बेंचों पर बैठ … बंद आँखों से अपने बीते दिनों को बुलाते … हम कहाँ कहाँ बैठते थे … अमरजीत कहाँ बैठती थी … शरारतों के लिए सबसे अच्छी जगह कौन सी मानी जाती … किस तरह जैन साहब चाक  से लिखते लिखते सो जाते और उनका सर बोर्ड से टकराता … साथी जोर से कहते ‘ सो गए ’ और जैन साहब जवाब देते …’नहीं … जाग रहा हूँ’ … और रोल कल के बाद जैसे ही वे पढाना शुरू करते , हम और अमरजीत एक दूसरे को देखते … आँखों में इशारा करते और वह सामने के दरवाज़े से और हम पीछे के दरवाज़े से क्लास छोड़ बाहर चले आते … जैन साहब पढ़ाते पढ़ाते कहते ‘ चले गए ‘ और सारी क्लास समवेत स्वर में कह उठती ‘ हाँ चले गए’ … जैन साहब की ऑंखें बोर्ड से चिपकी रहतीं … वे कहते ‘अच्छा हुआ’ और उनका पढ़ाना चलता रहता … यह क्रम रोज दोहराया जाता …
हम दोनों क्लास से निकलते … एक दूसरे का हाथ पकड़ते और कालेज के बरामदों से गुजरते … लड़के खिड़कियों में से झाँक झाँक कर हमें देखते … हम सबको डिस्टर्ब करते … हमें मज़ा ‘आती’ … केन्टीन में जा चाय पीते और हरी घास पर औंधे पड़े रहते … उन दिनों लड़कों और लड़कियों का एक साथ डोलना लोगों को विचलित करता था और हमारे कालेज में पोस्ट ग्रेज़ुएशन के अलावा लडकियां को एडमिशन नहीं दिया जाता था … हमारी शिकायत भी हुई थी … वार्निंग भी मिली थी … और हम हमेशा कहते ‘ हम क्या गलत कर रहे हैं ‘ … नीमबाज़ आँखों वाली … रक्तहीन सा सफ़ेद चेहरा लिए अमरजीत चुपचाप ही शरारतों का पिटारा बनी रहती …
उस दिन रैनक बाजार में गए थे कि अचानक एक धमाका हुआ … हमारे सामने जीत सिंह खड़ा था … अकेला … उसने पहचाना … दौड कर गले लगाया … ‘ओए तूं … सालेया … तूं , ओए तूं हजे तक मरेया नहीं’ … जैसे पल भर में वर्षों के सारी बातें और ‘दुर्घटनाएं’ कौंध कौंध सी गयीं … उस समय जाड़ों की बूंदा बांदी हो रही थी … सड़क भीगी थी … कितनी बातें एक साथ जी उठी थीं … जीत सिंह … हमारा जीत सिंह … जीत सिंह द ग्रेट … गंदा जीत सिंह … भद्दा जीत सिंह … बदतमीजियों की खान जीत सिंह … एक अजूबा सा जीत सिंह … सिर्फ अपने ही जैसा इकलौता जीत सिंह … चप्पल , पायजामा ,कमीज़ , पगडी और उसके साथ स्ट्राइप्स वाली टाई बांधे जीत सिंह … गन्दी गंदी बातों का खजाना जीत सिंह … पर यारों का यार जीत सिंह … खुद को हंस हंस कर लुटाता जीत सिंह …
शायद ही कोई दिन होता जो जीत सिंह की हरकतों के बिना पूरा माना जा सकता हो … क्या आप इस जीत सिंह को जानना चाहेंगे … उसके किस्से शुरू तो हो जायेंगे पर खत्म नहीं होंगे … सोच कर बताइयेगा …     


दूसरी पारी

Posted in Uncategorized on नवम्बर 27, 2011 by paawas

अरसे बाद पुराने बक्सों को खोलना समेटे हुए अचरजों को खोलने जैसा होता है सर्दी के दिनों में जब धूप खिली खिली होती हम एक एक कर कुछ पुराने बक्सों को बाहर लान में उठवा लाते … इतवार खाली खाली सा दिन होता … बेमानी सा चिल्लाता विविध भारती … हम आराम कुर्सी पर बैठे रहते … निर्मल घास पर बैठ जाती … ताले खुलते जाते …
और सहेज कर रखा गया सामान जागने सा लगता … एक परिचित सी गंध …दिखती सी गंध और पुराने दिनों कि छुअन जागने लगती … ‘साब जी … फिनाइल कि गोलियाँ कहाँ गईं’ … निर्मल सामान निकालती रहती और खुद से बातें करती रहती … खुद से क्योंकि हम तो वहाँ होते ही नहीं थे …गुड्डू की साडियां जिनकी हर तह से पुरानी यादें लपटों सी उठती महसूस होतीं … हर साड़ी के पीछे से कहानियां झाँकतीं … ‘अरे इस पर तो उस दिन सूप की बूँदें गिर गयीं थीं’ … हमें याद आता  … कुछ चीज़ों से लपटी कहानियाँ हांफ रही होतीं … हम कुछ देर उन्हें छोड़ देते … कोई नेकलेस … कोई चूड़ी … कोई कानों की चीज़ सब झाँकने लगती … जैसे आकाश के उस पार से गुडू कहती हो ‘ हमारी यादों को छूने का वक्त आज मिला है न ‘ … धूप में  आँखें चौन्धिआने लगतीं … निर्मल सारा सामान लान में बिछी चादर पर फैला देती और लगातार खुद से बातें करती रहती … बच्चे हमारी कुर्सी के पीछे खड़े हो देखते रहते … बीते समय का अनदेखा सा धुंआ फैलता रहता … सारा सामान दिन भर बिखरा रहता … उनसे जुडी गुड्डू धूप सेकती रहती …हमें उसकी आवाज़ सुनाई देती रहती ‘ धूप में बैठना अच्छा लगता है न … जाड़ों के सुख तो गर्माती धूप ही देती है … स्वेटर पहन लो … शाल ओढ़ लो … तुम्हारी कैप … और हम अचरज से भर देखते … निर्मल हमारी स्वेटर , हमारी शाल … और हाँ हमारी टोपी भी उठा लाती … लगता वह भी गुड्डू की उस आवाज़ को सुन रही होती …
हम खाना वहीं बाहर ही खाते … अखबार लापरवाही ओढ़े बिखरा रहता … हवा उसे घास पर बिखरा देती … चाय के कप अंदर बाहर चक्कर लगाते रहते … भरे हुए आते और खाली हो लौट जाते … हम आँखें मूंदें पड़े रहते … तीन बजे तक सूरज हमें देखता रहता … शायद बात भी करता … हम गुडू के सामान की चौकीदारी करते … गुडू जैसे घर के भीतर से , बाहर से , हमारी कुर्सी के पीछे से , हमारी बंद आँखों में सिमट … मुस्कुराती सी … बात करती रहती … निर्मल आती …’साब जी , सामान संभाल दें … धूप जल्दी से चली जायेगी’ … हम सुनते और जैसे अचानक गुडू कहती … ‘ धूप जा रही है … मैं जाऊं … अपना ख़याल रखना … बच्चों के साथ साग खाना , मक्की की रोटी बनवा लेना … तुम्हें कुछ कौर पिघलाए घी और गुड से खाना अच्छा लगता है … खा लेना … पर ज्यादा नहीं … कपड़ों में नीम के पत्ते भी डाल देना … बच्चों का ख्याल रखना … मैं जा रही हूँ …’ वह चली जाती … हम उसका चले जाना सहते रहते … निर्मल कपडे संभालने लगती … पुराने दिनों की गंध सिमटने लगती … बक्से बंद होने लगते … और ताले लगा दिए जाते … हमारा सहायक उन्हें उठा उनकी जगह पे रख आता … हम जैसे शो के बाद खाली हाल में अकेले रह जाते … गुडू आ आ कर अपने जाने के दर्द दोहरा जाती … चिंदी चिंदी हुआ मन खुद को सहलाता रहता …
बच्चे लौट आते अपने मित्रों से मिलकर … अपनी दिन भर की बातें सुनाते … अगले दिन की तैयारी में जुट जाते … हम बाजार से उनके लिए ज़रूरी सामान लेने जाते … खाली खाली से … भीड़ भरी सड़कों पर भटकते रहते … कभी किसी अकेली बेंच पर बैठ जाते … और फिर … एक बार फिर वही चेहरा सामने आ जाता … जैसे कहता हो ‘ सजाओं के दिन बीत जायेंगे … हम आपको ज़रूर मिलेंगे … आपकी यह आराधना विफल नहीं होगी … वरदानों के दिन भी आयेंगे … कुछ समय और … बस थोडा सा समय और …’ … जैसे कोरों से कोई आंसू की बूँद पोंछ जाता … बबल आती … लड़ती … ‘चेहरा पीला हुआ पड़ा है … माथा गरम है … सर दर्द भी होगा … कोई नहीं है न आपका … हम तो मर गए हैं न …’ वह रोने लगती , बाम लगाती चाय बनाती , हमें पिलाती … खाना बनाती … अपने घर में बच्चों को बताती कि देर से आएगी’ … ‘मैं आवां’ … एस पी कहता … ‘ हाँ एक तुम ही तो डाक्टर हो … आने से पहले फोन कर दूँगी … लेने  आ जाना …’ और कई बार उसे लौटने में देर रात भी हो जाती …  
हम कई बार छुट्टी ले लेते … हमें खुद लगता हम बीमार हैं … हमें अपनी आँखें धंसी हुई लगती … मंजीत , नागर तेजिंदर … सब आते और हम उन्हें कुछ न बता पाते …

दूसरी पारी

Posted in Uncategorized on नवम्बर 25, 2011 by paawas

हमें अक्सर लगता है कि वक्त बीत रहा है … क्या वक्त बीतता है … क्या वक्त जैसा कुछ होता है … सूरज के आने जाने को … कैलेंडर के वर्क बदलने को हम वक्त का बीतना कैसे मान लेते हैं … हमें लगता है वक्त नाम की चीज़ कभी नहीं आती और कभी नहीं जाती … ये तो केवल हम स्वयं घटते रहते है … बढते हैं , तो भी घटते रहते हैं … जन्म लेते ही हम घटने लगते हैं … घटना ही होता है और घटनाएं ही होती है …बुरा महसूस हो तो दुर्घटनाएं बन जाती है …
तो हम घट रहे थे … जालंधर की धूल भरी सड़कों पर हम घट रहे थे … हमारी कहानियां बिखर बिखर रहीं थीं … सड़कों पर , पार्कों में , बसों में , पेड़ों की छाया में , बरसात की बूंदों में , ओलों की प्रहार करती बौछारों में … यहाँ, वहाँ हर कहीं … हम बिखर रहे थे … मुशायरे होते , संगीत सम्मलेन होते , मेस के फंक्शन होते , हाकी के मैच होते नए वर्ष की रोशनी होती , दीपावली के पटाखे छूटते , पत्ते गिरते , फूल खिलते , सूरज तपता और तपाता … कुछ भी होता या नहीं होता पर हम होते रहते … घटते रहते …
हम किताबे देते और बबल पढती … थक थक जाती … अपने आप को उनसे जोड़ती और कोई नया सा विचार सामने लाती … हँसती , खुश होती और भूल जाती कि हम घट रहे हैं … क्या हम मैटर से  हुए घट रहे थे … क्या ऊर्जा बन  रहे थे … एक अजीब सा , सालता सा अलगाव … एक वैराग्य … और वही भटकन … एक अनजाना सा बहाव , एक गहरी सी निष्क्रियता … एक बोलती सी चुप्पी … बात करता सा विछोह … और वह चेहरा बार बार सामने आ छूने लगता … सामने आता पर कभी नहीं दिखता … वे अपनी आवाज़ भेज देतीं … शरीर से अलग हुई आवाज़ … हमें अक्सर लगता वे पहाडों पर मिलेंगी और हम धर्मशाला और मकलोडगंज  को निकल पड़ते …
अचानक ५६ ए पी ओ से भटकता छे महीने पुराना विमल का पत्र मिलता … ‘कहाँ भटक रहे हैं … हमें पता है आप भटक रहे हैं … हमारा रिश्ता आपकी रूह से है … हमें  हर बात का एहसास हो जाता है … हम से दूर तो आप कभी जा ही नहीं पायेंगे … हम आपके पास आना चाहते हैं … क्या हम आपका हाथ छू सकते है … हमने आपका हाथ अक्सर पकड़ा है … हम माफ नहीं कर पाते खुद को … हमने आपका हाथ क्यों छूट जाने दिया … क्या एक जीवन आपके साथ नहीं चल सकते थे … जानते है संभव था और कहते तो आप इनकार नहीं कर पाते … हमें माफ कर दीजिए … हम जगाधरी छोड़ रहे है … कहीं और जायेंगे … तय नहीं कहाँ … आपको लिखेंगे … आप अपना ख्याल रखेंगे … हमारे अगले पत्र का इंतज़ार करेंगे … आप मर तो नहीं जायेंगे …’ हम विमल का पत्र पढते … एक बार , दो बार , कई बार … वह पत्र में बसी महसूस होती , उसमे से झांकती महसूस होती और आँखें पोंछती महसूस होती … ‘ क्या एक बार … सर्फ एक बार पैरों की धूल माथे से लगाने देंगे ’ … हम संकोच से खुद को छुपाते से फिरते… हमने इस विमल को तो पहले कभी नहीं देखा था … क्या उसका हम से ऐसा रिश्ता था  … क्या उसके आस पास की दीवारें ढह रहीं है … उसके हाथों का स्पर्श महसूस होने लगता … ‘उसे क्या हो गया है’ हम सोचते रहते … अचानक हमें होली का दिन याद आता जब विमल ने कहा था ‘ इस बार तो सिर्फ आप के साथ ही होली खेलनी है … बस आपको ही रंगना है … आप हमारे रंगों को कभी भी धो नहीं सकेंगे … जब भी कोशिश करेंगे हम उसे गहरा करते जायेंगे … हमारे जीते जी तो नहीं धुलेगा …’ किकी ने सुना था … उसकी माँ ने सूना था … वे चुप थीं … अवाक … हमारे शरीर का सारा खून निचुड चुका था … ‘ हमें कह लेने दीजिए … आज नहीं कह पाए तो कभी नहीं कह पायेंगे … सब कहना आवश्यक है नहीं कह पाए तो घुट घुट कर जियेंगे’ … उसकी और उसकी और माँ की कई दिनों तक लड़ाई चलती रही थी … उसकी आँखें हमेशा सूजी रहतीं … पूछते तो कहती ‘रेशे की वजह से लाल हैं’ … वो महीने भर के लिए चली गयी थी … किकी से पूछते तो बड़ी बड़ी आँखें कर चिद्धाती ‘आ जायेगी , आ जायेगी … हमेशा के लिए नहीं गयी है … इंतज़ार करिये … जब आएगी तो अच्छा लगेगा’
विमल कहाँ है … कैसी है … उसके बाल कैसे है …क्या चेहरा वैसा ही है … क्या आवाज़ वैसी ही है … क्या याद करती है … घट घट कर कैसी हो गयी होगी … क्या याद है कि कैसे तेज साइकिल चलाया करती थी … दो चार टक्कर तो मामूली बात थी …
उसे ढूँढेंगे कभी …

तुम लौट आओ

Posted in Uncategorized on नवम्बर 22, 2011 by paawas

 

अगर तुम लौट कर आ जाओ
हम ये वादा करते हैं
कभी न हाथ छोड़ेंगे
कभी न साथ छोड़ेंगे
तुम्हारे साथ रहकर एक लंबी बात लिखेंगे
तुम्हारे साथ मिलकर गायेंगे कुछ गीत खुशियों के
सभी रंगों को लेकर ओढनी बुन कर बनाएंगे
तुम्हें पहनायेंगे कपडे मचलती सी हवाओं के
सुनहरी धूप से उजले तुम्हें जेवर दिलाएंगे
तुम्हें बातों से घेरेंगे तुम्हारा मान रखेंगे

तुम्हारे साथ ही आखिर में हम भी मर ही जायेंगे

अगर इक बार आ जाओ हमारे सामने फिर से

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तुम्हारे पास जीते थे
तुम्हारे पास रहते थे
तुम्हीं को घेरे रहते
झूमते गाते हुए मौसम
तुम्हीं को देखते खिलते
तुम्हीं पर हो फ़िदा जाते
हज़ारों जंगलों के
पेड़ पत्ते फूल डालों के

तुम्हारे साथ बीते दिन सुनहरे याद आते

कहानी

Posted in Uncategorized on नवम्बर 22, 2011 by paawas

अगर सागर किनारे ठंडी ठंडी रेत पर लेटो
बड़े धीरे से छू छू कर हमेशा गुदगुदाती है

किसी भूले हुए साथी की अक्सर याद आती है

कहीं पर ऊंची ऊंची ढेरियाँ थीं भीगी यादों की
कहीं सपने जगाते सोंधे सोंधे प्यार के किस्से

तुम्हारे साथ जन्नत की इमारत साफ़ दिखती थी

बड़ी लंबी सी दूरी तैर कर वो पास आया था
हज़ारों कोंपलें उगने लगीं थीं मन की डालों पर

मगर लम्हे बना ये वक्त फिर से दे गया धोखा

हमें सोए हुए झरनों को छूना खूब आता है
हमें रूकती हुई नदियाँ बहुत नज़दीक लगती हैं
पसीने सी बहाती चोटियों के साथ चलते हैं
कभी सागर के ऊपर नाचते खामोश रहते है

ज़रा नज़रें झुका के देखना हम पास ही तो हैं …

दूरियां

Posted in Uncategorized on नवम्बर 19, 2011 by paawas



बड़ी लंबी
हुई जातीं हैं बेलें
सूनी राहों की

बड़ी सुनसान है
इस जिंदगी की
अब इमारत भी

चमकती चोटियों के
बीच में
फैली खलाएं है

पकड़ ले हाथ
इतने हाथ
लंबे हो नहीं सकते

कई सदियों की दूरी
साथ लेके
अब चलेंगे हम