अक्टूबर, 2011 के लिए पुरालेख

दूसरी पारी

Posted in Uncategorized on अक्टूबर 31, 2011 by paawas

दूसरी पारी … हाँ … इसे हम दूसरी पारी कहेंगे … हम एक बार फिर जालंधर जा रहे हैं  … बरसों बाद … इस बार एक सीमित अवधि के लिए जाना होगा … शायद तीन बरस के लिए … इस बार क्या होगा … कौन कौन मिलेगा … क्या कुछ अवशेष बचे होंगे … क्या साथी , पुराने साथी … होंगे … क्या उसी चाव और बेफिक्री को दोहराएंगे … हम आपको अपने इन दिनों का भी एहसास कराते हैं … आप हैं न … सब तैयार हैं … लो हम आ रहे हैं …
———–

       हमने जालंधर छोड़ दिया दिया था पर क्या सचमुच छूट पाया था जालंधर … जीवन के हर मोड पे … हमारी हर बात में … हमारी हर धडकन में वो वक्त और वो बाते जिंदा रहीं … जीवन ने रास्ते बदले … हम सैनिक स्कूल पहुंचे और फिर कुछ ही दिनों में भारतीय सेना अकादमी देहरादून ट्रेनिंग करने पहुँच गए … ट्रेनिंग का एक वर्ष बीत गया और दिसंबर की एक रात भोर की पासिंग आउट परेड के बाद हम सेना में अफसर बन गए … जालंधर की बातें हमसफर रहीं …
कुछ दिन के छुट्टी और फिर पहली पोस्टिंग लद्दाख … जमी हुई सिंधु नदी , बंकर ,ग्लेसिअर , बौद्ध मठ , जमी हुई झीले ऊंचे ऊंचे पास … बला कि ठंड और कांपते अंतर … हम शराब पीना नहीं सीख सके … हम झूठ बोलना और बहाने बनाना भी नहीं सीख सके … हमारी डाक में माँ की चिट्ठियाँ होती और जालंधर की चिट्ठियाँ होती … ‘आप कहाँ हैं … क्या कभी याद करते हैं … क्या कविता लिखते हैं … हमें पत्र लिखते रहेंगे न …’ हमारे पत्र सेंसर हुआ करते थे … उनके पत्रों के साथ कभी कभी नोट मिलता …’लक्की यू’ …
एक छोटा भाई मोस्को में उच्च शिक्षा को जा चुका था और  उससे छोटा राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के बाद भारतीय सेना अकादमी में ट्रेनिंग पा रहा था … कुछ ही दिनों में हमारी माँ को दो फौजी अफसरों और एक वैज्ञानिक की माँ होने का गर्व मिलने वाला था …
हमारे पैरों में चक्कर थे … हमें यहाँ से वहाँ और वहां से वहाँ और  जाने कहाँ कहाँ घूमना था … इसकी बात फिर कभी … मन ललचाता जालंधर की पोस्टिंग को जिसके लिए अभी पच्चीस वर्षों की दूरियां तय करनी थी … उनकी चिट्ठियां कम होने लगीं थीं और धीरे धीरे बंद हो गयीं थीं … वे अपने माता पिता और इंदु के साथ जालंधर छोड़ चुकी थीं … एक गुमनामी का दौर शुरू हो चुका था और गहराता जा रहा था … कभी कभी मन पुकार उठता …’ कहाँ हैं … क्या कर रहीं हैं … क्या कभी नहीं मिलेंगी … आप से कहनें  को बहुत सी बातें जमा हो गयी हैं … हमें माँ बहुत याद आती है …’ हम माँ को भी लिखते ‘आप भी तो हमारी माँ हैं न, वैसी जैसी हमारी अपनी माँ भी नहीं हो सकीं’ … उत्तर न आने थे … न आये … इंदु कभी कभी इधर उधर कि बातें करती … ‘समय के पत्थरों पे आपके निशाँ जम चुके हैं जो कभी नहीं मिटेंगे … सब उन निशानों को  संभाल के रखते हैं … किसी दूसरे जन्म की बातें हैं … हम खुद हैरान होते हैं … अपनी उन तस्वीरों को पहचान नहीं पातें … हमने दौड कर छीनना नहीं सीखा … इसकी सज़ा हमेशा पाते रहेंगे … क्या हम सब … कुछ न कुछ खोने को ही इकट्ठे हुए थे … मा उदास हैं मन से बूढी हो रहीं हैं …’ वे फाइन आर्ट्स के लिए अहमदाबाद और फिर मुंबई जा चुकी थीं … कुछ समय को पेरिस भी जाने वाली थीं …’ आप उसे नहीं पहचान पायेंगे … जैसे किसी कैद से आज़ाद हो गयी है … उसे हर काम जल्दी करना है … शादी होनी थी पर एन वक्त पर मना  कर दिया … परिवार की हुज्जत हुई … सब कटने लगे …’ … कहती रहीं ‘शादी तो तभी होनी थी … अब नहीं हो सकती … पता देने को मना किया है …’
मासूम से संबंधों ने क्या क्या कर डाला …
राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में पोस्टड थे जब अचानक खबर आयी कि जालंधर का तबादला हुआ है … मन उचका और किसी सैंड पिट में जा गिरा … पच्चीस बरस का लंबा वक्फा और अब जालंधर … इन पच्चीस बरसों में क्या क्या हो गया होगा … दहशत गर्दी का दहला देने वाला माहौल … पच्चीस बरस पहले के बच्चे अब अपने बच्चों के साथ भूमते होंगे …सड़कें और पार्क … माल रोड … रीगल और डिफेन्स … दिलकश सा बाजर … गालियाँ , मोहल्ले … केन्द्रीय विद्यालय जहां हमारे दोनों भाई पढ़े थे … क्या हमारे छोटे का बनाया रिकार्ड कायम होगा … हमें कौन कौन पहचानेगा … डीएवी कालेज के लोग क्या गले लगाएंगे … बसों पे उडनतश्तरी की तरह उड़ते महसूस करना … आकाशवाणी … युवमंच … श्री गुप्ता जो पहली बार हमें रेडियो पे लाये थे … कौन कौन मिलेगा … वे तो नहीं होंगी … क्या पता हों … क्या सब लोग होंगे … इंदु मिलेंगी क्या … दादी के बिना बस्ती शेख कैसी होगी … मन सोचता रहता … अभी पुणे छोड़ने में समय था … लगभग चालीस पैंतालीस दिन … दोनों बच्चों को हाथ पकड़ बैठाते और जालंधर के लिए तैयार करते … वे सुनते और थक थक जाते हमारी बातों से …
क्या कोई हाल ही में जालंधर से आया है … आर के लुधिआना  से है शायद कुछ बता सके … एक अकुलाहट भटकाती सी अकुलाहट … रातों की नींद को तोडती सी अकुलाहट … पुणे का चाँद बादलों में छुपा रहता … हम उसमे जालंधर के अक्स नहीं ढूँढ पाते …
अपने फ़र्ज़ निभाते जा रहे थे … खाली समय इंतज़ार में बीतता रहता …   

 

Advertisements

हमारे दिन

Posted in Uncategorized on अक्टूबर 27, 2011 by paawas

आइये चलें वहाँ जहां रिश्ते मोड पे आ अदृश्य हो जाते हैं … पर बने रहते हैं … कुछ नया नहीं जुडता कहानियों में पर पुराने स्मृति कोष हरे भरे बने रहते हैं … पात्रों की ग्रोथ थम जाती है पर रिश्ते और भी हरे बने रहते है … वे पुराने होने लगते हैं पर बुढापे की झुर्रियाँ नहीं आती …
हमें जालंधर छोडना था … हमें उनका जालंधर छोडना था … उनको उनके जालंधर में छोड़ विलग होना था …और इससे जुड़े सम्भावित  तूफ़ान का ख्याल ही सिहरा जाता था …वे सहमी हुई थीं और इंतज़ार कर रहीं थीं उस दिन का … सब कुछ रेत हुआ जा रहा था … बहती नाव में जैसे एकाएक पानी भरने लगे …नाव खड़ी हो जाए और किनारे परे खिसकने लगें …हम पुकारें और आवाज़ गले में अटकी रहे … … चेहरा पीला पड रहा था और वे लान में पेड़ों पे अटके घोंसलों की बातें करती रहती … खामोश बिलख रही थी , बात बात में आँखें भर लातीं ‘आप के बिना हम क्या हो रहेंगे … क्या करेंगे , कभी सोचा भी नहीं था कि आप से दूर हो जीना पड़ेगा …कैसे कैसे वादे लेतीं , कसमे देतीं … और रोने लगतीं … माँ और इंदु के चेहरे मुरझा गए थे … ‘इसे भी ले जाइए’ माँ कहती …हमें उनके घर दिन में दो बार जाना पड़ता … हमने उनको अपना अधलिखा सब दे दिया … ‘इसे पूरा करिये हम देखने आयेंगे’ … ‘फिर हमें साथ ले जायेंगे … हम आपसे शादी कर लेंगे कोई सवाल नहीं करेगा … ‘हम आपके साथ हमेशा रहेंगे’… ‘धत कैसी बात करती हैं … कभी ऐसा भी हो सकता है’ … ‘क्यों नहीं हो सकता’ … ‘परियां कभी मामूली इंसानों से शादी नहीं करती और हम तो शायद शाप ग्रस्त भी हैं … क्या आपका जीवन बर्बाद करेंगे’ … ‘अच्छा किसी और से शादी कर लीजियेगा … हम एक ओर पड़े रहेंगे … कुछ नहीं चाहेंगे , कोई जिद नहीं करेंगे’ … माँ सुनती रहती और फिर कमरे में जा रोने लगती … रो रो के आँखें सुजा लेती’ … अकेला देख इंदु हाथ जोड़ कहती ‘इसे ले जाइए … आप से दूर मर जायेगी… माँ जी लेंगी … हम भी जी लेंगे पर इसे दीमक खा जायेगी’ … हम लान में आ पेड़ के सहारे सर टिकाये आँखें बंद किये खड़े रहते … आंसू भर आते … वे आतीं … हमारे चेहरे के एक ओर उनका और दूसरी ओर इंदु का गाल चिपका रहता और तीनो चुपचाप रोते रहते … माँ खामोश देखती रहतीं …
परिस्थितिओं की कैद में आरजुएँ और तमन्नाएं बिलखती रह जाती हैं … हमारे अंतर का ढेर सारा कुछ रेत  हो भुरभुराता  रहता है … हम तो उस समय भी किसी को खोज रहे थे पर क्या जान सके थे कि इन्होने कहीं भीतर अधिपत्य जमा लिया था … हम खुद को दे दे के पाते हैं और जो पातें हैं उसका अंदाजा हमें कभी नहीं हो सकता … इतने बर्फीले तूफानों के बाद भी कोटों कि स्निग्धता खो पाई क्या … मन के कमरे खाली हो जाते हैं और उम्र भर वैसे ही खाली रहते हैं … उम्र बीत जाती है और सन्नाटे दौड लगाते रहते हैं … कोई नहीं आता उन सन्नाटो को अपनाने … जैसे असाध्य सा रोग लग जाए और करीब आता कोई दूर से ही रास्ते बदल ले … मन जूठा हो जाए … जूठे मन को कौन अपनाता है … बहुत कुछ हुआ पर चाहा हुआ कुछ नहीं हुआ … न वो चेहरा मिला न उन्हें हम मिले … माँ बेबस बनी रहीं और इंदु जैसे बेवजह लुट सी गयी … अनायास कि उग आये रिश्ते रक्तहीन परछाईयाँ हो रहे … और हमने उनके साथ उनका शहर छोड़ दिया …            

हमारे दिन

Posted in Uncategorized on अक्टूबर 24, 2011 by paawas

‘मुट्ठियों में ख्वाब भींचे देर तक सोया रहा …’ आपकी बात सुनते हैं तो एक बात याद आती है … कुछ लिख रहीं थीं … खामोशियों से घिरी कहीं दूर चली गईं थीं … हम पालतू बकरी से एक पेड़ से बाँध दिए गए थे … हमें उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना था … उनकी अबसेनस को सहना था और तल्लीनता को भंग नहीं करना था … वे लिखतीं और काट देती … फिर लिखती और फिर काट देतीं … जैसे पतंग उड़ाने की कोशिश कर रहीं हों और पतंग बार बार ज़मीन पर आ गिरे … लिख रहीं थीं …
‘अपने ख़्वाबों को बचाएं तो बचाएं कैसे
हाले दिल तुम को बताएं तो बताएं कैसे  
रात भर देर तलक गिरती रहीं हैं बूंदे
तुम को दामन में छुपाएँ तो छुपाएँ कैसे
पास आओ तो कहें दिल की जो हालत है हुई
दूर बैठे हो तो महसूस कराएं कैसे …’
हम ने पढ़ा तो कहा … इसे हम ले जाएँ … कुछ जोड़ देंगे … ‘नहीं … आप अलग से लिखिए … हम नहीं चाहते गर्द छा जाए उजले कांच पर … आप जो कहते हैं कांच जैसा होता है … नाज़ुक और साफ़ उससे इसका मेल नहीं हो सकता … आप कांच नहीं संभाल सकते … आप से टूट टूट जाता है … इसी लिए सहेजते है आपका कहा …’ इतने दिनों में जो भी कहा बिखरा बिखरा टूटा टूटा सा ही लगता है … हम कभी नहीं संभाल पाए खुद को और उस सब को जो मिला था … उन्होंने ठीक कह था … हम कुम्हार की मिटटी है … कपास का फूल हैं … कोई कबीर आया ही नहीं चदरिया बुनने को … मिटटी के बर्तन हुए टूटते ही तो रहे … छुपा छुपा सा एक चेहरा हाथ पकड़ भरमाता रहा … वक्त के उस मोड पर न वे बाँध सकीं और न ही हम मुकम्मिल हो सके … अखूरे सोच , अधलिखी कहानिया , कुछ लावारिस से मिसरे हुए भटकते रहे आज तक … यदि हाथ थामना था तो कच्ची पगडंडियों पे चलने को झिझक क्यों पाली … पुरानी सी एक गज़ल का मतला आवारा डोलता  रहता है  …’भूल कर भी ये गेसू , गर बिखर गए होते , उनका क्या बिगड जाता , हम संवर गए होते …’
वे काफी समय लिखती रहतीं … कुछ पढाती और बाकी तह कर मन की अलमारी में रख डालती … तह कर लिखा हुआ जिस अलमारी में रखा था वह अलमारी खो गई है … ढूँढो भी तो नहीं मिलती … छानते है वक्त की ढेरियाँ … आँधियों में उडती धूल को टटोलते है हाथों से … पर हाथ कुछ नहीं लगता … गाजरी रंग के सूट में वे दिखती तो  है पर उनकी बातें दिशाओं के परे जा छुपी हैं … फिर भी पराई सी हुई वे रास्ते भुलाती रहती हैं … क्या रास्ते दिखाने वालों से रास्ते भुलाने वाले ज्यादा दुखी करते है … शायद हाँ … शायद नहीं …
आपने चाहा तो हमने उनकी कहानी कही … असल में ये हमारे दिन नहीं … उनके दिन हैं … वो हमारा जालंधर नहीं , उनका जालंधर है , वो हमारे मौसम नहीं उनके मौसम हैं … वो दिन रात , वो हवाएं वो बारिशें वो घटाएं , कवितायेँ और गीत , चर्चाएं और संगीत … माँ और इंदु यहाँ तक कि विमल भी , सब उनके हैं … एक शरीररहित प्रेत का क्या होता है … क्या हो सकता है … हमारा न कुछ था और न ही है …


हमारे दिन

Posted in Uncategorized on अक्टूबर 22, 2011 by paawas

ऐसा ही होता है … ऐसा ही होता रहा है … यादों की बातें कभी खत्म नहीं होतीं … यादों में ढला होता है वो सब जो हुआ होता है … वो भी होता है जो होते होते रह गया … और वो भी जो होना चाहिए था पर नहीं हुआ … इन सब का एक ऐसा ब्लेंड जो एक पूर्णता सी इख्त्यार कर ले … जहां घटनाएं ठहरती हैं वहीं  पूरी अधूरी उम्मीदें , कल्पनाएँ आ इकट्ठी होती हैं … एक दूसरे का हाथ पकड़ मुस्कुराती हैं और आगे बढ़ लेती हैं …हमारा आज और आने वाला कल लीनिअर भले हो , अतीत तो नन लीनिअर ही होता है … वहाँ रास्ते सड़कों जैसे नहीं होते … जैसे हम रैंडम मोड में कोई रिकार्डिड कहानी सुन रहे हों … शायद यह भी एक कारण हो यादों के उबाऊ न होने का …
आँखें थक गयीं थीं और हम बात करते करते आँखें बंद कर चुप हो गए थे … उन्होंने टेबल पर रखा हमारा हाथ सीधा किया और हथेली खोल अपना छोटा सा हाथ हमारी हथेली पर रख दिया … हमने देखा … वे मुस्कुरा रही थीं … हमने कहा ‘आपका छोटा सा हाथ कितना सुन्दर है … कुछ पहनिए … एक छोटी सी रिंग …’ …. ‘आप ला दीजिए हम ज़रूर पहनेंगे’ … ‘अरे हमारे पास पैसे कहाँ हैं इतने’ … ‘ताम्बे का एक छल्ला ला दीजिए … हम वही पहनेंगे … हमेशा … और कुछ भी नहीं पहनेंगे …’ हम अवाक हो गए … ‘एक ताम्बे का छल्ला … क्या देंगे आप हमें …’ माँ हँसने लगीं … इंदु मुस्कुराती रही … ‘हमें पता है … समय आने पर आप आसमान के तारे तोड़ के ला देंगे पर ताम्बे का एक छल्ला नहीं देंगे ….’ उनका गला भर्रा गया … माँ ने उनके सर पे हाथ रखा … इंदु ने उन्हें अपने से चिपका लिया … ‘माँ …’ माँ ने उन्हें देखा …’ तुम पागल हो … ‘
उन्होंने लिखा
                        ‘चांदी सोने के नहीं मिटटी के सपने हैं मेरे
                        ऐ खुदा मुझको मेरी मिटटी की दौलत दे दे
                        सोना चांदी मेरा दे दे जो मांगे इसको
                        मुझको बस साथ में चलने की इजाज़त दे दे
                        जो मिले साथ तो मिल जाए नेह्म्तें सारी …’
उनके शब्द दरवाज़े खटखटाते रहे … सदाएं देते रहे … हाथ पकड़ रोकते रहे … वे मुखर रहीं … जाने क्या था जो उनकी हर बात को अनसुना करता रहा …

हमारे दिन

Posted in Uncategorized on अक्टूबर 19, 2011 by paawas

माडल टाउन तब छोटा सा था … शाम को मिल्क बादाम कि ठंडी बोतले मिलतीं , कुल्फी मिलती और जाड़ों में मिलता गाजर हलवा … सड़क किनारे खड़े हो कर खाने का लुत्फ़ कुछ और ही होता , वहाँ छावनी में ज्वाले कि दूकान थी … उसके पकोडे यू के भेजे जाते … हम मजाक नहीं कर रहे हैं … यह सच है … और उसके सामने कैलाश सोड़ा वाटर फैक्टरी है … वहाँ कंचे वाली  मोटी सी बोतल में भरा मसाला लेमन आज भी तरसाता है …
सड़कों किनारे लोग सूट बेचते जिनकी क्वालिटी उत्तम होती … एक सौ रूपये का सूट मुम्बई की हीरोइनों को ललचाता … दो पीस डबल रोटी ( जाने इसे डबल रोटी क्यों कहते हैं ) के स्लाइस लो उनमे एक गरम गरम समोसा दबाओ … हल्का सा सास … सेंडविच तैयार … चाय के कप के साथ निगल लो … ऐसा बढ़िया नाश्ता केवल जालंधर ही मुहैया करा सकता था …
वे और इंदु हमें कई बार माडल टाउन ले जातीं … अपने हाथों से गोल गप्पे खिलाती … उस दिन हमें मुंह खोलने को कहा और पानी भरा वो पतला सा गोला टूट गया … उनका दुपट्टा भीग गया … इंदु से दुपट्टा बदला … एक बार फिर एक गोल गप्पा मुंह तक आया और टूट गया … दुपट्टा फिर भीग गया … अब के माँ से दुपट्टा बदला … तीसरा प्रयास … और एक बार फिर इतिहास ने अपने आप को दोहराया … आस पास खड़े लोग मुस्कुराए और चिल्लाए … ‘हैट ट्रिक … गोलगप्पों की दुनिया की पहली हैट ट्रिक’ … ‘हमें गोल गप्पे खिलाना नहीं आता’ … ‘नहीं , शायद हमें गोलगप्पे खाना नहीं आता’… आँखों में छोटे छोटे मोती … ‘कोई बात नहीं … हमें यह कभी नहीं भूलेगा’ हमने कहा … हमें यह छोटी सी बात कभी नहीं भूली … कोई भी घटना उसे स्मृति से हटा नहीं पाई … बहुत सी भीड़ में छूती छूती सी रहती है यह बात … हम उन्हें कैसे बताएं कि ये विशाल बूइंग सा मन उनकी हर बात को यात्रियों सा ढोता रहता है … बात यहाँ होती है और ब्रिस्बेन और मरिशस में गूँज सुनाई देती है …
हम अपने परिचित से ग्रे डबल निट में छुपे होते और वे लंबे से कोट में लिपटी रहतीं  … सर्दी कि ढलती शामों में बेंच पे बैठ आइस क्रीम खातीं … धुंध  हमें निगल जाती … कोहरा बालों में अटकने लगता और वे बैठीं रहती … हमारे बर्फीले हाथ को अपने कोट की जेब में छिपा लेतीं … हमारे गाल , ओंठ नीले पड जाते और हम बैठे रहते … हमें याद आते हमारे बचपन की मार के दिन जब हम सब बिन रोये ही सहा करते थे … विमल को लिखते तो वह कहती … ‘अपना बचपन इनके सामने मत रखना … आपकी दौलतों को ग्रहण लग जाएगा’ … हमने उन्हें कुछ नहीं बताया था …
एक बार हमारा जूता फट गया था … उसमे से , लाख छुपाने पर भी मौजे बाहर दिखने लगे थे , … उन्होंने देखा … भीतर गयीं और बहुत समय तक नहीं आयीं … माँ आयीं … ‘ रो रही है … जाइए संभालिए’ … ‘जाइए हमे नहीं बात करनी आज … आप आज ही नया जूता लेंगे’ … ‘अरे ये … गलती से पहन आये हैं … हमारे पास दूसरा है’ … ‘ अब झूठ मत कहिये … हम आपको जानते है … क्या सच कह रहे है’ … हमारी नज़रें ज़मीन पे गडी रही … ‘नहीं , झूठ है …  पर नया ले लेंगे … इसे ही रिपेयर करा लेंगे न … अभी तो अच्छा भला है … खूब चलेगा’ हमने कहा था …
लिख रहे हैं तो छोटी छोटी तस्वीरें जैसे उचक उचक के कह रही हैं … ‘हम भी … हम भी’… कभी लगता है जैसे कोई स्लीपिंग बैग फट गया हो और गर्मी देते हजारों पंख बिखर बिखर जाएँ … हम जिन्हें नहीं पाते उन्हें खो कैसे देते हैं … जो हमारे नहीं होते वो पराये क्यों कहलाने लगते है … जो अपने नहीं होते वो क्या पराये होकर मन को और भी आर्द्र नहीं कर जाते … पास आये किसी का दूर होना काफी दर्द देता है … पर बिना पास आये … बिन अपना हुए जब कोई पराया हो जाए तो … अपनों के दर्द सालते हैं … परायों के दिए दर्द सुलगाते है … कई बार …
क्या अपनों और परायों में कोई अंतर होता है … हां , अपने अपने होते हैं और पराये पराये … पर परायों की एहमियत कम हो ऐसा तो नहीं होता न … हम परायों से भी तो जुड जाते हैं … वे अपनी नहीं थीं , जानते हैं … पर क्या पराई थीं … मन भटका करता था …
मुस्कुराते से रिश्ते मंडराते रहते हैं … कभी कभी लगता है कि ये हम नहीं जी रहे होते … ये तो नामालूम से पारदर्शी रिश्ते सांस भर रहे होते है …
हुक्के की गुड गुड हो जेसे … सुनते रहते है सब … थोड़ी सी गुड गुड और फिर तस्सल्ली भरा धुआं … क्या हम यादों के कश लेते रहते हैं … हुक्के के साथ साथ फेफड़े भी बजने लगे हैं … फ्राक और निक्कर पहने छोटे बच्चों तरह लगती हैं ये यादें जो मन के गलियारों में खेलती , दौड लगाती रहती हैं …  

हमारे दिन

Posted in Uncategorized on अक्टूबर 19, 2011 by paawas

जालंधर सच में बदल रहा था … लिबास बदल रहे थे … स्वरुप बदल रहे थे … सड़कों पे गूंजते गीत बदल रहे थे … शोर बदल रहा था … आकाशवाणी के चेहरे बदल रहे थे … राज आहूजा रिटायर हो गयी थीं … कुछ आवाजें दिलकश होती हैं … हम उनकी तस्वीरें मन में बना लेते हैं … और हकीकतें आ झटक देती हैं … हमें आकाशवाणी दिल्ली कि मधुमालती बेहद छरहरी लगतीं … हमें लगता वे मधुबाला जैसी होंगीं … पर उन्हें देखा तो चौंक उठे थे … रफ़ी साहब की तस्वीर देखी तो काफी समय तक यकीन नहीं हो पाया कि वे अपनी आवाज़ में गाते थे …
उन्होंने सुना तो हँसने लगीं … ‘अच्छा , यदि हमें न देखा होता तो अपने मन में हमारी आवाज़ से आप हमारी कैसी तस्वीर बनाते’ … हमने सुना … जैसे धरती एक ही पल में हज़ारों बार अपने अक्ष पे घूम गयी … ‘ बताइये न … हम आपको अपनी आवाज़ के ज़रिये कैसे दिखते ’
हमारी दृष्टि धृष्टता की हदें पार कर उनके चेहरे पर टिक गयी … हम पत्थर बन गए … जीवित होने की सारी चेष्टाएं निर्वाक सी हुई बेबस हो गयीं … ‘वे और केवल आवाज़ हो जाएँ और हम उन आवाजों को आकार दें’ … कल्पना मात्र से मन थर थर कांपने लगा … हमें लगा धरती पर गिर पड़ेंगे … और कभी खड़े नहीं हो पायेंगे … ‘उनके होने का एक भी अंश खो जाए तो’ … आशंकाओं के भय … थरथराता सा वजूद … ‘यदि रात का अंधेरापन न रहे तो क्या रात रात होगी … पानी का गीलापन न हो तो पानी पानी लगेगा … बरसात की बूँदें रास्तों में अटक जाएँ तो इंतजारों में डूबी आत्मा कैसे अधीर हो उठेगी’
यदि ऐसा हो गया तो … हम उनके बिना उनकी आवाज़ को कैसे आकार दे पायेंगे  … क्या कुछ हमेशा के लिए नामुकम्मिल नहीं हो जाएगा … हमारा परिचित सा कुछ बेहोशियों के पार हुआ जा रहा था …
रक्त पानी होता जा रहा था … हम अशक्त होते जा रहे थे … लग रहा था कि धरती पर गिर पड़ेंगे … एक खौफ सा घिर आया था … उन्होंने हमें देखा … ‘क्या हुआ … आपको क्या हुआ है … आप ठीक नहीं है …’ हम भय से घिरे हुए थे और खामोश हो गए थे … कई घंटों तक खामोश हो गए थे … कई दिन तक असर रहा था … क्या आज भी कभी कभी वही भय नहीं घेर लेता है हमे …
जो हमारा नहीं था उसको लेकर हम ऐसे क्यों थे … आज भी क्यों हैं … क्यों मन चाहता है कि सब बना रहे …अंतिम श्वास तक बना रहे … हो सके तो आने वाले जन्मों में भी बना रहे … वो सब बना रहे जो हमारा नहीं है …
मन जब भी किसी से जुड़ता है , तो नाज़ुक कांच का होता जाता है … मन के लगाव प्रायः हमें कच्ची मिटटी का बना देते हैं … क्या नाज़ुक होना रिश्तों की क्वालिटी दर्शाता है … रिश्तों के  ये नाज़ुक धागे जब टूटने लगते है तो क्या इतने गहरे नहीं उतर जाते कि फिर निशाँ कभी न मिटें …
वे नाज़ुक थीं पर क्या कमज़ोर थीं … वे क्या प्रहारों से टूटीं … हम इस बारे में सोचते हैं तो जैसे परे फिसल जाती हैं और मुस्कुराने लगती हैं … इतने बरसों में साथ साथ रहीं हैं पर हमारी नहीं हैं …
उनके घर के सामने से जाती सड़क एक कच्ची पगडंडी का रूप ले लेती थी … वहाँ एक पुलिया थी जिस पर हम अक्सर बैठ जाया करते थे … वहीं बैठ वे बहुत सी बातें करती थी … हम वहीं बैठ उनकी बातें सुना करते थे … और बातों के दौरान वे हमें वहाँ बैठा अक्सर कहीं दूर निकल जातीं … भूल सी जातीं हमको … उनका चेहरा बदल सा जाता … अपनी बातों में कई बार वे अकेली हो जातीं … पर देर तक नहीं … वे अक्सर हमारे हाथ पकड़ लेतीं … हमें लगता , जैसे हमारे हाथों के सहारे वे अपनी बातों को कोई सीढ़ियों चढ़ा रही हों … उनकी बातों में आल्प्स होते , विएना होता , ब्रस्सल होता , प्राग होता … वे बादलों की तरह उडती नज़र आतीं … और हम विस्मित और विभोर हुए उनको निहारते रहते … अचानक शकील साहब की गज़लों की बात करने लगती …
हमारी आँखों के भीतर देखती और कहतीं,
                        ‘जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मुहब्बत का शकील
                        हम को अपने दिले नाकाम पे रोना आया’
और डाल  पर बैठा कोई पक्षी एकाएक उड़ जाता … ‘देखिये उड़ गया हमारा दिल … आप एक छोटी सी  चीज़ भी नहीं संभाल सकते … ‘ ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक …’
कभी कोई शाम इतनी बातें भी करती है … हमें अक्सर लगता था कि ये वे नहीं बल्कि ढलती शाम है जो एक दास्ताँ सुना रही है  
अब जब दूरियां घिर आयीं हैं तो शामे और भी मुखर हो गयीं हैं … यादें और भी पैनी साफ़ और ताज़ा …

हमारे दिन

Posted in Uncategorized on अक्टूबर 17, 2011 by paawas

कभी कभी लगता है हमारे वे दिन ऐसे हैं जैसे कोई बच्चा अपनी स्केच बुक , क्रयन कोई पेन्सिल एरेसर और वाटर कलर फर्श पर छोड़ गया हो … बिखरा बिखरा सा यह सामान बरसों से वैसे ही पड़ा है … शायद वैसे ही पड़ा रहेगा … धडकती सी शिला सा … इनकी बात करना … इनसे बात करना वक्त के मोटे परदे के पीछे छिपे पहचाने रहस्यों को छू छू आने जैसा है … हम कैसे हुआ करते थे … लोग कैसे हुआ करते थे … बसों में भर भर कर धूल उड़ाता , भागता … जीवन कैसा हुआ करता था …
हमने जालंधर छोड़ा तो हम वैसे नहीं रहे … जालंधर भी तो वैसा नहीं रहा हमारे बाद … सब बिखर गए … सब बिखर गया … पर यह बात कुछ दिन बाद करेंगे …
मोटर बोट चली जाती है तो पानी में राह दिखाती लहरें नज़र आती है … दिनों की  राह  दिखाती तस्वीरे फ्रीज़ हो फोसिल हो गयी हैं … जैसे कोई उड़ता पक्षी अपने उड़ते पंखों के निशा छोड़ जाए … या फिर कोई हवाई जहाज आकाश में ऊंचा … बहुत ऊंचा … ओझल सा हुआ … धुंए से अपने होने की दास्तान लिख जाए …
हम उनके घर जाते रहे थे … नियम नहीं टूटे थे … हम बातें करते … उनके हाथ को सहलाते , उनके बदलते कमरे को सराहते , उनके नए पर्दों की , फर्नीचर की , तारीफ़ करते , उनके मोच आये हाथ पर मलहम लगाते , क्रेप बेंडेज लगाते … पर लगता हम कहीं बीत चुके हैं … हम होते … पर ना हुए जैसे … हम क्यों इतनी जल्दी ऐसे बड़े हो गए … मासूमियत के वे हलके हलके से दिन … उड़ते से रूई जैसे नरम नरम दिन … क्यों बदल गए …
हमारी हर कविता का पृष्ठ उनकी फ़ाइल में गुम हो जाता … वे जिद करके  ले लेतीं और हमें उन पृष्ठों से कोई मोह नहीं था … उनका लिखा लेने में हमें संकोच होता … हम उनसे अपने अधिकारों की बात कभी नहीं कर सके … हम अधिकार जैसे शब्द पर तुच्छता के टैग लगे पाते …कागज़ की किश्तिओं सी हमारी बातें उनके मन की झील में गल गल जातीं … बहुत समय बाद हमने कुछ पन्ने इंदु के पास देखे थे … इंदु उन्हें अपने घर के मंदिर में तस्वीरों के पीछे छुपा कर रखती … विमल को बताते तो हँसती … उसे इंदु बहुत अच्छी लगती थी …
सोचते हैं तो लगता है कि विमल एक सेतु थी  जो हमारे रांची और जालंधर के दिनों को जोड़ता था … वो न होती तो हम एक तट से दूसरे तट तक ना जा पाते … रांची का ठहरा समय और जालंधर का बहता वक्त … दो अलग तस्वीरें थीं बस एक हम खुद और एक विमल ही दोनों में थे … जड़ हुए हम और चेतन सी विमल …
वे वृद्ध होती जा रही थीं … बुद्ध होती जा रही थीं … बहस करने लगीं थीं … चुप रहने लगीं थीं … हमें देखते ही वे वैसी ही हो जातीं … बड़ी बड़ी आँखों वाली नाटी सी सुंदर सी बचपन भरी खूबसूरत लड़की …
चार बरसा बीत रहे थे … हमे जालंधर छोडना पड रहा था … उन्होंने सुना तो जैसे सारा खून पल भर में निचोड़ लिया गया हो … अवाक थीं … ‘अब हमारा क्या होगा … कैसे जियेंगे हम … हमें कौन दिखायेगा आस पास का सब … आँखे हमारी है पर दिखाते तो आप है … कान हमारे है पर सुनवाते तो आप हैं … शब्द हमारे हैं पर बातें तो आपकी होती हैं … हमें मार डालिए फिर चले जाइयेगा … माँ , इन्हें कहिये हमें मार डाले … उसके बाद ही जाएँ’ …
‘इंदु इन्हें रोको न … अच्छा ये आपके सर हैं … हम इन्हें तुम्हें देते हैं … इन्हें रोक लो , कैसे भी रोक लो’ … बिलखती सी शाम और हम उन्हें आश्वस्त नहीं कर पाए थे … रिश्तों की सिलाई कितनी पक्की होती है … खींचती है तो दिलों को खींच कर ज़ख्मी और लहू लुहान कर देती है … उन्हें सरदर्द होने लगा … हमने उन्हें लेटाया और पास कुर्सी पर बैठे रहे … उन्होंने हमारा हाथ कस के पकड़ लिया … ‘आप नहीं जायेंगे … नहीं जायेंगे …’ इंदु की आँखें भर आयीं … ‘हम है … हमेशा हैं … हमेशा है’ … हम उनके कानों में कह रहे थे … वे सो जाती और फिर हडबडा के जग जाती … सारी रात ऐसे ही कटी …
हम चाहने लगे थे कि हमारा जाना टल जाए … पर यह हो न सका …