सितम्बर, 2011 के लिए पुरालेख

हमारे दिन

Posted in Uncategorized on सितम्बर 28, 2011 by paawas

‘एक किताब जिसे लिखा जाना है अभी … जिसे मैं कभी नहीं लिख सकूंगी …’
‘क्यूं लगने लगा है कि मेरी कहानी कोई और लिखेगा … एक कहानी जिसे लेखक की तालाश है’
‘हर लम्हा गुनगुनाता सा लगता है … मैं उसे सुनूं … मेरी खामोशिआं कुछ कहती रहती हैं मुझसे … बचपन छूट रहा है पीछे … कुछ बदल सा रहा है … बस माँ ही समझती है मुझे … क्या वो सब कुछ जानती हैं’
‘सब दौड रहे हैं … सब आगे निकलना चाहते हैं और मैं … मैं हार जाना चाहती हूँ’ …
‘गिरते पीलाते पत्ते क्यूं अच्छे लगते हैं अब … क्या मेरी पहचान खो रही है … क्या नई पहचान मिलेगी … कैसा होगा सब … क्या अकेले ही चलना होगा अब’
‘ कैसे बदल गए मेरे रात दिन … कौन बदल रहा है मुझे … मुझे भटका देने वाले कितने एहसान हो रहें हैं तेरे मुझपर … कहीं दब तो नहीं जाऊंगी एहसानों तले’
‘मेरा वक्त सिमटता जा रहा है … वक्त इतना तेज क्यूं चल रहा है … कोई रोके इसे ज़रा’
बहुत सी बातें …बहुत से जुमले … बेफिक्र से जुमले … आवारा से भटक रहे हैं … रस्सा कशी चल रही है … पर  तब ऐसा नहीं था … शाम होती और दिन के इंतज़ार शुरू हो जाते … दिन आता तो शाम की सोच खींचने लगती … ‘क्या हो रहा है आजकल … लगता है पीने लगे हैं … आपकी आँखों में वक्त अंगडाइयां लेता है …’ लोग कहते … ‘कितने मुशायरे चल रहे है भीतर’ … आप बहुत बिजी हैं आज कल … हम आपकी आँखों में उगते और ढलते सूरज देखते है … सारे के सारे मौसम देखते हैं … दरबारी और मालकौंस और उदास करती भैरवी , भोपाली और शिवरंजिनी , मल्हार और भूप , सब एक साथ सुनाई देते हैं … ढूँढ़ते हैं तो मिलते नहीं हैं आप … बस खोजते रहना चाहते हैं … देर देर तक ढूँढना चाहते है … भटकना चाहते हैं … तारे टिमटिमाते हैं … तो दौड दौड कर उन्हें गले लगाना चाहते हैं … हमें क्या हो रहा है …’ उनकी कापिया बातें करतीं … किताबों में से झांकते कागज़ , के टुकड़े बात करते रहते , उनका खामोश ख़याल बात करता रहता … ऊपर आकाश में वायु सेना के विमान चीखते चिंघाड़ते से फिसल जाते और सोच पल भर के लिए फेड हो जाती … पीली धूप शाल ओढा जाती … दरवाजों पे क्रिसमस और नये वर्ष लाता दिसंबर कदम ताल करता रहता … बाद … बहुत बाद हमें ऐसा लगा था कि वीरान सर्द यूरोप का दिसंबर घेर घेर के बुला रहा था उन दिनों … उनको देखते तो लगता जैसे गर्म गर्म कोट के कालर में फूल से झांकते रहते हैं … फिर लगता एक ही फूल है जो नित नए लिबास पहनता रहता है …
बहुत से लिबास मन के कोनों में तह किये रखे हैं … और फूल सा वो एक चेहरा रास्तों से भटक गया है …
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दे दें तुमको

Posted in Uncategorized on सितम्बर 27, 2011 by paawas

आ रहा
नज़दीक वो पल
सोचते हैं देख लें अब
क्या बचा
कितना बचा है …
अनबुझा
आलाव सा वो
स्तब्ध सा
झोंका हवा का
हाँ वही झोंका
कि जिसमे
खुशबुएँ
खोजी थीं तुमने
सूने सूने
कच्चे कच्चे
रास्ते
बिखरी ढलाने
ओढ़ के यादों की चादर
जिनपे चलना चाहती थीं
एक छोटी नाव जिसको
ख्वाब में तुमने गढा था
ख्वाब का पैबंद था तुमने लगाया
‘साथ चलते नाप लेंगे
सागरों की दूरियां सब’
एक सूनी दोपहर
जब हाथ पकड़ा था हमारा
बस वहीं पर 
सीढियां सारी की सारी
रुक सी जातीं थीं जहां पर
सीढियां जो ले गईं ऊपर मगर
बिसरा गईं थीं
रास्ते आने के नीचे
बस तभी तो
आज भी ऊपर के ऊपर
रह गए हैं हम टंगे से
छत अकेली भीगी भीगी
जिसपे बरसातों में
कितने बीज धोए
पर नहीं बोए कहीं पर
बीज जिनपे फूलना था
जिंदा जिंदा धडकनों को
बीज वो सारे के सारे
आज भी बिखरे पड़ें हैं
अन्बोये हैं
टूटे टूटे ख्वाब जिनकी 
सिसकियाँ सुनती हैं अब भी  
  पैनी पैनी गोदती सी 
आज भी चुभती हैं किरचें
सब को देखें सब को परखें
कर इकठा डाल दे
डिब्बे में सब कुछ
और कह दें लो संभालो
आज भी दिल है धडकता
वैसे ही उतना ही तुमको
सारी बातें हैं ज़मी की
सब ज़मी पे ही रहेंगी
साथ तब से रह रही थीं
साथ अब न जा सकेंगी  

हमारे दिन

Posted in Uncategorized on सितम्बर 27, 2011 by paawas

सर्दी लगातार बढ़ती चली जा रही थी … कोहरे की गहरी सी मोटी चादर लगभग दोपहर तक छाई रहती … आदमपुर में पारा शून्य को छूने लगता … मरी मरी बीमार धूप अस्पताल जाती बीमार बूढी नानी सी लगती जिसके लिए हर कदम उठाना दुश्वारियों भरा लगता …लाइब्ररी के हॉल और केबिन फ्रीजर जैसे ठंडे हो जाते और वहाँ कोई नहीं आता … हम बाहर लान में बैठ जाते और नई  किताबों को एक्सेशन रजिस्टर में चढाते … कॉल नम्बर देते … केटलग कार्ड बनाते और उन्हें केबनट में पिरोते … हमे डेवीज़ क्लासिफिकेशन समझ आ रहा था … हमें दोनों तरह के कार्ड बनाने आ कए थे …
वे जल्दी घर लौट आतीं … इंतज़ार करतीं मिलतीं … काम किया मिलता … उन्होंने हमारे गणित की  कई पाठ्य पुस्तकें खरीद ली थी ,,, ई टी कोप्सन . टीशमार्श … बैसंत और रामसे … बैल , हार्डी और राइट … नीवन … सब उनके पास थे … हम चमत्कृत थे , सोचा करते … कि क्या हो रहा था … हम उनसे कोई भी पुस्तक नहीं लेते … वे उदास हो जातीं … पर हम एहसान लेना नहीं चाहते थे … हमारी क्लास में कई लडकियां थी जो दिल से गणित नहीं पढ़ना चाहतीं थीं … कुछ भी पढ़ना नहीं चाहती थीं … किसी दबाब के चलते एडमिशन ले लिया था और अब पास होना था … हम उनसे किताबें ले लेते और उन्हें प्रश्नों के हल दे देते … बदले में हमे रोज नाश्ता और चाय मिलने लगा … हम हिंदी में स्नातकोत्तर करने वाली लड़कियों के डेस्ररटेशन लिखा करते … और हमारे बढ़िया नाश्ते की जुगाड हो गई थी … हम मेहनत करते और नाश्ता कमाते …
वे हमारी रफ नोट्स देखतीं और आनेवाले दिन की कल्पना करती … फिर सवाल करतीं … हमें अवाक क्र देतीं … रात को देर देर तक जगतीं … आँखों के नीचे काले काले निशाँ गहराते जाते … हमे सुख मिलता पर पीड़ा भी होती … हमने इंदू और माँ से कहा था … ‘हमारी आवश्यकता नहीं है … वे ज्यादा मेहनत कर रहीं है और इतने परिश्रम की आवश्यकता नहीं है’ … माँ चौंक जातीं … ‘आप बीच में नहीं छोड़ेंगे … किसी भी कीमत पर नहीं’ … ‘पर आप बेकार पैसे दे रहीं हैं’ … माँ की आँखें भर आतीं और हम फैसला नहीं क्रर पाते … आप इस घर में केवल इसके लिए आते है … क्या हमारे लिए और इंदु के लिए नहीं आते … आपको नहीं लगता कि आप आते हैं तो हमारे सुख भी आते हैं … आप हम दोनों के भी तो टीचर हो … वे उदास हो जातीं … रूठ जातीं … हमें मनाना पड़ता … वायदे करने पड़ते कि कभी नहीं छोड़ेंगे … अगले बरस भी नहीं छोड़ेंगे … और समय बीतता जा रहा था … पिता के दो सौ रुपये से अधिक पैसे आने लगे थे घर में … हमारा छोटा  भाई भी सौ रूपये ले आता था … और हम ढाई सौ …
दिवाली आई और चली गई … हमने मिठाई के डिब्बे नहीं लिए थे … कुछ भी नहीं लिया था … वे मुरझा सी गई थीं … हमारी दी मिठाई के अतिरिक्त कुछ भी नहीं खाया था … माँ की ऑंखें भर आयीं थीं … इंदु ने कहा था … पर हम नहीं माने थे …
वे कम बोलने लगीं थीं … खिलखिलाती कम और उदास सी मुस्कराहट फैलाती रहतीं … कहीं खोई रहती … हमारी कवितायेँ गायब करती रहती … हमारी कापियों के पन्ने टटोलती रहती … कुछ भी लिखा मिलता तो पन्ने फाड़ के छुपा देतीं … ये सब  हमारा है … पढ़ाते तो वे कई बार हमें देखती और खोई हुई मिलतीं … हम रुक जाते … वे कुछ पल सर टेबल पर टिका बैठी रहतीं … बात बात पर आँखें भर लातीं … माँ उन्हें दुलारती … हम कुछ दिन आराम की बात करते तो वे रोतीं … आप आते रहेंगे तो आराम भी करेंगे … नहीं आये तो बस देख लेना … मर जायेंगे … ‘आप ज़रूर आना … आते रहना‘  … ‘ इन्हें क्या हुआ है ‘ …’ आप नहीं समझ सकते ‘ … ‘ हम अपनी बेटी के मन को समझते है ‘ … ‘आप नहीं आयेंगे तो बस क्र देंगे …जान दे देंगे’ वे लिख लिख के देतीं … माँ को दिखाते … वे हमारे सर पे हाथ रख मुस्कुराती रहती …

हम घर और देर से लौटते एक अज्ञात और अभूत पूर्व सी बैचेनी घिर घिर आती … माँ अक्सर कहती … ‘आप समझ नहीं पायेंगे और हम या कोई और समझायेगा नहीं … घबराएं नहीं … वो ठीक हो जायेगी’ …
सोचते हैं क्या वो ठीक हो पायीं … क्या हम समझ सके … उदास सूरज की उदासी तो समझ आ रही थी … ठंडक खोती चांदनी की चिंता अब मायने खोने लगी थी … वे ऐसी क्यों हैं … हम खुद डूबने लगे थे …

हमारे दिन

Posted in Uncategorized on सितम्बर 25, 2011 by paawas

प्रभात फेरियां और शब्द कीर्तन और सड़क किनारे लगती छबीले जालंधर की पहचान हैं … साम्प्रदायिक दंगों और फसादों से जालंधर प्राय: अलग रहा है प्यार और सम्मान हवाओं में बसता है … हर लड़की हीर और हर गबरू राँझा लगता है ,,, हर बजुर्ग दुआएं देता फरिश्ता … लंबी सफ़ेद फेहराती  दाढ़ी खामोश हिलते से ओंठ , सुखों और आशीर्वादों की बौछार करते महसूस होते हैं …
‘ साथ तुम होते हो और दूर तलक कोई नहीं …’ चांदी के स्पर्श बिखेरती ठंडी उजली सी चांदनी किसी लहराते दुपट्टे सी लगती … और दुपट्टों के पीछे से छन छन के दिखते चेहरे … जैसे सारी कायनात झूम झूम के गाने लगे …’ साथ तुम होते हो और दूर तलक कोई नहीं ‘ … हम उस चेहरे को ढूँढ़ते रहते … तारों के रक्स में क्या हम  उसे पहचान पायेंगे … हम विस्मृत बचपन से शुरू हो यादों की हर सड़क छान मारते … कोई डोर उस चेहरे तक नहीं ले जाती … हर इक  डोर का दूसरा सिरा खाली मिलता …
हमें लगता था कि जैसे एक नाद सा है … अंतर्नाद नाद सा … जो जागते सोते . उठते बैठते , चलते फिरते सदा बना रहता है … अंतर में झांको तो जोर से सुनाई देता है … हम कई बार , एकाएक , सुबह तीन बजे जग उठते … कुछ देर सूनी तस्वीर जैसी ‘ स्टिल ‘ हुई सड़क को देखते … लगता धवल वस्त्रों में बड़ी बड़ी दाढ़ी वाले एक बुज़ुर्ग चले आ रहे हैं … कुछ कुछ सोभा सिंह के नानक जैसे … वे पल भर के लिए रुकते हैं , आशिर्वाद देते हैं … मुस्कुराते है … हमारा मन वेग से दौड़ता है उनकी ओर … पलकें खोलते हैं तो वहाँ कोई नहीं होता … और फिर एक मूर्छा सी घेर लेती है और घेरे रहती है सारा दिन …
एक रोज हमने ये बात उन्हें बताई थीं … वे स्तब्ध थीं और पास कड़ी माँ रो रहीं थीं … उन्होंने हमारे सर को अपने से चिपका लिया … ‘ आप कौन हैं … आप क्या हैं … आपने हमारे घर जन्म क्यों नहीं लिया …’ माँ रोये जा रही थीं … और वे उठीं थीं और हमारे पैरों के पास आ बैठी थीं … हम लज्जा और संकोच में डूबे जा रहे थे … हम माँ से अलग हुए … ‘ छी … क्या कर रही है … उठिए … कुर्सी पर बैठिये … कभी ऐसा भी होता है क्या …  माँ देखिये ये हमे परेशान कर रही हैं …’ माँ हंसी …  ‘ हम अपनी बेटी को बहुत प्यार करते हैं … हमें उस पर नाज़ है ‘ … और वे भीतर चली गयीं …
उस दिन घर में माँ नहीं थीं … इंदु थी … हम आये थे … उन्हें पढाया था … इंदु और उनके साथ चाय पी थी … ‘ आज आप घर नहीं जा रहे हैं ‘ … ‘ अरे क्यों ‘ …  ‘माँ ने कहा है … देखिये ‘ … और माँ ने लिखा था … ‘ बहुत जिद कर रहीं है दोनों , आज इनके पास रुक जाइयेगा … शायद बहुत सी बातें करना चाहती हैं … असुविधा तो नहीं होगी …’
हमें संकोच हो रहा था … घर पे  ड्राइवर सन्देश पहुंचा आया था … हमारे कपडे भी ले आया था …  पर सब अजीब लग रहा था … हम आँख मूँद रिक्लाइनर पर लेट गए थे … वे कुछ समय के लिए भीतर कईं थीं … लौटीं तो काफी का मग हाथ में था …… हमें कविता सुनना है …
एक लंबी यात्रा शुरू हुई थी … मीर . मजाज़ , ग़ालिब और साहिर , शहरयार , मजरूह वसीम साहब और फिर तुलसी महादेवी बच्चन … कभी पंकज मलिक तो कभी जगमोहन कभी रफ़ी साहब तो कभी लता कभी मुकेश तो कभी हेमंत और तलत महमूद कभी शेली तो कभी टेनिसन और ब्रिजिस और बर्न्स … हम कविताओं के साथ आवारा घूम रहे थे … हम खुद अचंभित थे … हमने कैसे ये सब भीतर इकठा कर लिया था … कभी तो हमारी बात एक मोनोलोग सी हो जाती थी … हम घने से मौन में आवाजें हुए भटकते लगते थे … और वे दोनों शांत आँखें मूंदे कहीं खोई हुई सी … वे इस बीच उठीं थीं और इंदु के लिए शाल ले आयी थीं … खुद भी शाल में छुप गयीं थीं और हमारे पैरों पे कम्बल डाल दिया था … हम सारी रात कविता , कहानी पेंटिंग और थिएटर की दुनिया में घूमते रहे थे … कमलेश्वर , राजेंद्र यादव धरमवीर भारती और निर्मल वर्मा , अज्ञेय और प्रेमचन्द … सब का साथ निरंतर बना रहा था … उन्होंने वीरेंद्र मिश्र के कुछ गीत याद दिलाए थे … इंदु ने बात की थी सूर्यभानु गुप्त की …रात कब भोर को बुला लायी पता ही नहीं चला … चार बजे हमने पाया कि वे दोनों रीक्लईनर्ज़ ने सो रहीं थीं … हमने आँखें बंद कर लीं और लेटे रहे …

हमारे दिन

Posted in Uncategorized on सितम्बर 24, 2011 by paawas

हम उनके साथ नहीं थे … पर किसके साथ थे … ऐसा होता हैं , अक्सर होता है … हमे लगता है कोई हमारे साथ है पर हकीकत कुछ और होती है … हम जीवन में बार बार इसी स्थिति से गुजरते है और हर बार भोली मासूम उम्मीदें जी के जंजाल बनती जाती हैं …फिर दस ,बीस , पचास या सौ बरसों में ये उम्मीदें और एहसास … कराहते और रिसते  से शून्य छोड़ जाते  हैं … सदा के लिए … हमारी ‘हार’ कहीं गहरे सुख देती है … हारते रहना बच जाता है एक एहम विहीन तरल सा वजूद देकर ,,, और जीतना भ्रम सा लगने लगता है …  
हमारे दिन हमें इसी ओर ले जा रहे थे … काफी अरसे बाद हमें सुनने को मिला था …’ हम आप को छू नहीं पा  रहे हैं … आप हमें कभी नहीं देखते हो … हमेशा यही लगता है कि जैसे हम कांच के बने हैं और आप हमारे पार कुछ देख रहे हो … तालाश कर रहे हो … आपकी आँखें आज तक हम पर नहीं रुकीं ‘ … ‘ आप क्या ढूँढ रहे हो ‘ … ‘ अच्छा कुछ भी ढूँढो , पर रहना हमारे पास … ऐसे ही ठीक है सब ‘…
कहाँ छूट गई थी बातों की कड़ी … हमें तो कुछ कहना भी नहीं आता ….
उन्हें गणित अच्छा लगने लगा था … ‘ अच्छा बताइये , आप क्या पढते हैं . हम जानना चाहते हैं …’ हम उन्हें बताते उन खोजों के बारे में जो हमें रोमांचित कर  जातीं थीं … उनसे गॉस और फरमा कि बातें करते … एलिमेंट्स की बातें करते … परिभाषा कि परिभाषा की  बातें करते … विधाओं के बदलते  स्वरूपों की  बातें करते … मिन्कोस्की की बात करते … लैटिस सत्रकचर्ज़ की बातें करते … रामानुजन की कहानियां बताते … वे तन्मय हो सुनती … नंबर थिऊरी की पुस्तकें देखती और पढ़ती भीं … हमें अचरज होता और भला भी लगता …
वे स्मृतियों को बुनने के दिन थे … बातें लंबी लंबी और सलोनी सी होती जा रहीं थीं … अँधेरे छाने लगते और बरामदों को  काले रंगों से भर देते … खम्बों की बत्तियों के गिर्द फैलता सा स्मजड आलोक बड़ा होता रहता … और बाते चलती रहतीं … वे साहित्य की बातें करतीं , कविता और गीत की बातें करती स्काटलैंड के बर्न्स की बातें करती . मौड की बातें करती … हम उन्हें पुराने अनुवाद सुनाते … वे रेडियो नाटकों की बातें करतीं … सलाम मछली शेहरी के ‘आवाज़ की दुल्हन’ की नायिका के किरदार को निभाने वाली मधु मालती कि बातें करती …
कभी कभी माँ भी आ बैठती पास और हमारे सर पर हाथ रख देर तक सुनती रहतीं … इंदु भी कई बार बैठी रहतीं साथ में … हम पास पास के मोढों पर बैठे रहते , निकट पर बहुत अलग … कई बार बात करते हुए हमारी आँखें बंद होती और कई बार मुंदी पलकों से वे सुनतीं रहतीं और कभी यह भी होता कि न हम कह रहे होते और न ही वे सुन रहीं होतीं … अलग अलग स्थानों में हम भटकते रहते … और पास पास बैठे रहते …

हमारे दिन

Posted in Uncategorized on सितम्बर 23, 2011 by paawas

जालंधर से कई नाम जुड़े हैं … स्वर्ण सिंह , गुजराल साहब . महात्मा हंसराज , अमरनाथ , अजीतपाल , बलबीर , तरसेम और हाँ संत हर्बल्ल्भ , … फिर कुंदन लाल सहगल , पाकिस्तानी शायर हफीज़ जालंधरी … ‘अभी तो मैं जवान हूँ’ और पाकिस्तानी नेशनल एंथम वाले … और भी बहुत से नाम होंगे …
हमें वो शाम याद आ रही है जब शाम से शुरू हो मुशायरा अगली सुबह एक बैठक में बदल गया था … रायजादा स्टेडियम में दिल्ली के शायर नरेश कुमार शाद की याद में मुशायरा आयोजित किया किया गया था … पत्नी वर्षा शाद को एक पर्स भेंट किया गया था … कई शायर शरीक हुए थे और अगर हम ठीक से याद कर पा रहे है तो उनमे  बशीर बद्र और कैफी आज़मी साहब भी थे … हमने उस दिन साहिर लुधिआनवी साहब को सुना था … सुबह के दो , ढाई बजे तक बैठे रहे थे … पर  साहिर साहब तो उसके बाद ही दूसरे रूप में नज़र आये थे … तल्खियां और परछाइयां … ‘ …दूर वादी में दूधिया बादल झुक के परबत को प्यार करते हैं , दिल में नाकाम सी हसरत लेकर हम तेरा इंतज़ार करते हैं ‘ और फिर ‘ तस्सवुरात की परछाइयां उभरती हैं …’ कितने जन्मों के कितने अतीत लौट लौट आ रहे थे … और हर बार वही एक चेहरा … वोह चेहरा जो सब कुछ भुला भुला सा  रहा था … हम नहीं थे कहीं भी बस अंतर में उगती सदियों की भीड़ थी … खामोश आवाजें और डालियों पे झूलते , ओंठ हिलाते , खामोश फूल …
‘ … डूबा डूबा सा दिल उदास लगे …’ सोच थे कि तूफानों से दौड रहे थे … विचारों के उड़ने वाले कालीन , जैसे ले उडेंगे हमें … और ले जायेंगे वहाँ जहां कोई नहीं होगा … स्मृतियाँ इतनी कि विस्मृतियों की भी हंदें लांघ जाएँ … हमें याद आया  हम कैसे  तेज बुखार में बडबडा रहे थे उस दिन … क्या उस दिन जैसा ही हो रहा था … क्या उस दिन भी ऐसा ही हुआ था … एक ओर साहिर साहब और उनके चाहने वाले थे और वहाँ उस तरफ … अपने में गुम अकेले हम … हम बंटे हुए थे … ठंडी तेज हवाएं छू छू के बुला रहीं थीं और हम डूबते जा रहे थे … कैसे कैसे स्पर्श थे जो गहरी गहरी झुर्रियों से हो रहे थे … झुर्रियाँ जो बुद्धापों को भगाती रहती हैं …
हम लिखते रहे थे … उन्होंने पढ़ा था … पढ़ पढ़  के सहमी थीं और सहम सहम के पढ़ा था … जंगलों कि भटकन आँखों में उतर आई थी … ‘ हमे लग रहा है हम कहीं उड़े जा रहे हैं , हमें डर  नहीं लग रहा है आप हमारे साथ हैं और अकेलापन नहीं है … हम किसी घुटन से आज़ाद हो रहे हैं … आपको छू के देखें आप हो ना … बहती बहती सी धारा हुए जा रहे हैं आप …’ वे कहे जा रहीं थीं … हम सुन रहे थे पर वहाँ नहीं थे … उनके साथ थे पर उनसे अलग थे … हम किसके साथ थे …   

हमारे दिन

Posted in Uncategorized on सितम्बर 22, 2011 by paawas

   
हमारा जालंधर सचमुच अद्भुद था … ऐसा जैसा केवल वह ही सकता है … क्या हम कह सकते हैं कि एक अजीब सा भोलापन था तब जो हर आने जाने वाले को बाहों में समेटता रहता था … हाथ थाम के रोक लेता और बतियाने लगता … नारियल सी धूप … बाहर जानलेवा सर्दी की कड़ी सी सख्त परत और भीतर कुंकुनाती सी खुशनुमा छुअन … जैसे आइस क्रीम कि कड़ी परत के भीतर बहती बहती सी चाकलेट हो … तन को कहते बोलो ‘सर्दी नहीं है … बस नहीं है’ … और गुदगुदाती सी गर्माहट घेरने लगती … ये हमारा जालंधर था जिसमे जुबली होटल की चहल पहल थी … पैदल डोलती सी चेहल पहल … रंग बिरंगे कारडीगनों में खूबसूरती बिखेरती चहल पहल … बागों की नरम नरम घास पर पसरी उनींदी सी चहल चहल … उकडूं बैठे बुजुर्गों की आँखों से बहती , प्यार लुटाती …  चहल पहल …
सर्दियाँ और … रंगों के जमघट से घिर आते … लोग भुनी मूंगफली कुतर कुतर के खाते … हमें इस तरह से मूंगफली खाना क्लास की एक लड़की अमरजीत ने सिखाया था … हम उस की बात बाद में करेंगे …
हम जीत सिंह की भी बात बाद में करेंगे … बुरे शब्द के लिए माफ कर दीजियेगा … वह सचमुच एक प्यारा सा ‘कमीना’ दोस्त था … जिन्होंने उसके साथ कुछ समय बिताया है , उन्हें , हमारा उसे इस तरह से याद करना बुरा नहीं लगेगा … जीत सिंह महान था …
उस रोज हम गए तो वे , माँ और इंदु लपक के आयीं हमारी ओर … ‘सुनिए , इसे सुनिए ‘ हमें स्पूल वाले टेप  रिकॉर्डर के सामने बैठा दिया गया और जो हमें सुनाया गया वह हमाँरी एक वार्ता थी जो कुछ दिन पहले ही युव मंच में प्रसारित हुई थी … ‘ किसकी आवाज़ है ’ …’ क्या पता ‘ …  ‘अब बनिए मत  … पहचानिये …’ … ‘ नहीं पहचान पा रहे है … बहुत बेकार आवाज़ है ‘ … ‘ हम रो देंगे , हमारे सर की है … आप इसे बुरा नहीं कह सकते ‘ … ‘ अब बुरे को तो बुरा कहेंगे ही न ‘… ‘ अच्छी तो है ‘ माँ ने कहा … हम चुप हो गए … ‘ दो दिन से टेलीफोन पे सुना रही है सब को ‘ बम्बई तक पहुंचा दी है आपकी वार्ता …

‘ अच्छा हमें भी रेडियो पर आना है ’ … ‘ शक्ल देखी  है अपनी ‘ इंदु ने कहा … हम चाय पीते रहे … माँ हँसती रहीं … उस दिन बहुत सी बाते होती रहीं … हमारी परेशानी देख कहने लगीं … ‘ हमने सारा काम कर लिया है , कुछ ज्यादा भी कर लिया है … आप परेशान मत हों ‘


हम उनकी एक्सरसाइज़ बुक ले कर घर आ गए … अचानक लगा कुछ गलत हो गया है … उनमे से एक कापी  उनकी रफ नोट बुक थी … “ हमें डाक्टर नहीं बनना है … टीचर बनना है … डाक्टर तो शरीर का इलाज करते हैं और टीचर तो आत्माओं में समां जाते है … हमें लोगों के दिलों में रहना है “ … ‘ सर ऐसे क्यों हैं , हम उन्हें समझ क्यों नहीं पाते … कैसी पीड़ा है जो हाथ से निकल निकल जाती है ‘ हमे भी उन जैसा बनना है … बस एक बार कुछ कह देते हैं  … तो जैसे  जंगलों में रास्ते बनने लगते है ‘ क्या हम सच में किसी टीचर को देख रहे हैं ‘ … ‘हमे फिल्म देखनी और कविता पढनी क्यों नहीं आती’ … ‘वो इतने यूरोपीय चित्रकारों को कैसे जानते है … उन्हें थिअटर किसने सिखाया ’ … ‘हम बहुत छोटे हैं … कैसे उन जैसा बन  पायेंगे ‘ … ‘ हम क्या उन के लिए कुछ नहीं कर सकते … उनके किसी काम नहीं आ सकते … वो बादलों और नदियों से कैसे दोस्ती कर लेते हैं … वो सागरों और आसमानों की गहराई कैसे नाप लेते हैं … पहाड़ों की बर्फों से ठंडी ठंडी बातें कैसे चुन लाते है … क्या मौसम उनकी ही बात मानते है…’
हम पढते जा रहे थे और मन शिथिल होता जा रहा था … दीवार पर अचानक मुस्कुराती विमल का चेहरा उभर आया था … ‘ हम बहुत खुश है ‘ …
हम देर तक अँधेरी छत को घूरते रहे थे … कहीं कुछ टूट रहा था … टूटते कांच की आवाज़ चुभती ही जा रही थी … कहीं लहू बह रहा था और दिखाई नहीं दे रहा था …