अगस्त, 2011 के लिए पुरालेख

हवाएं

Posted in Uncategorized on अगस्त 12, 2011 by paawas

बच्चों जैसी लगती हैं ये तेज हवाएं
हाथ थाम के रोज घटाओं का उडती हैं
जंगल पे मैदानों पे नदियों नालोपे

खाली खाली हल्का हल्का कर देती हैं
खो जाती हैं जाकर अनजाने देशों में

बरसातों की भीगी भीगी मस्त हवाएं

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बस ऐसे ही

Posted in Uncategorized on अगस्त 12, 2011 by paawas


कोई तो है जो सदा साथ साथ चलता है
और रुक जाता है थक के कहीं चलते चलते
मुड के देखो तो वो  हो जाता है गुम सा जैसे
डाल पर सहमा सा सोया सा परिंदा कोई
एक एहसास कराता है कि कुछ खोया है
बैठ कुछ देर उसके आने को जी लेते है
और फिर लौट के ले आते हैं उस रूठे को

तुम अगर चाहो तो

Posted in Uncategorized on अगस्त 12, 2011 by paawas

हम कहीं पर भी नहीं होते हैं ये सच जानो
एक लंबी सी खला साथ लिए चलते हैं
एक उलझाता गणित साथ साथ चलता है
और ये वक्त भी खामोश पड़ा रहता है

न ही कुछ अच्छा बुरा तब हमें छू सकता है
न ही आवाज़ न खुशबू ही कोई होती है
न कोई स्वाद न भीगी हुई सी कोई छुअन

न कोई रात न ही कोई सवेरा सा कहीं
न खुशी कोई न ही दुःख कोई गहरा गहरा
न हंसी कोई न ही कोई उदासी सी कोई
एक जिंदा सा बिना दिल के धड़कता सा वजूद
फैला रहता है हमेशा से हमेशा के लिए

ऐसा बेरंग सा बे गंध सा फैला सा वजूद
तुम अगर चाहो तो मैं तुम को दिखा सकता हूँ

तुम्हारी बातें

Posted in Uncategorized on अगस्त 12, 2011 by paawas

तुम इक बच्चे
सी लगती हो 
 
मीलों तक लंबे मोटे से धागे के आगे
बाँध एक डिबिया को
बातें मुझे सुनाती 

वो बातें जो साथ में रह के

कानों में मेरे कहनी थीं

दूर से आतीं ये बातें
अपनी लगती हैं …

तुम जैसी ही तो लगती हैं

तुम्हारी यादें

Posted in Uncategorized on अगस्त 12, 2011 by paawas

सिर्फ जिल्द पीली है

यादों की पुस्तक में

यादें तो गीली हैं

ताज़ा गुलाबों की भरमाती खुशबू सब ओर फैली है
सरगोशियों में तो

तुम भी हो , तुम ही हो
बस इक अकेली की

बातें तुम्हारी हैं …

यादें तुम्हारी हैं
यादें जो जिल्दों के पीछें हैं …

ताज़ा हैं

अपनों जैसा अपना

Posted in Uncategorized on अगस्त 12, 2011 by paawas

जो तुम कह दो

बातों के गुलदस्ते टेबल पर ला रख दूं

रख कर आँखों से ओझल  हो जाऊं ऐसे ,
जैसे तुम भी रूठ रूठ कर छुप जाती हो
देर देर तक तुम्हें मनाना होता है फिर
खेल अगर ऐसा तुम से भी मैं खेलूँ तो
तुम को मेरी तरह पता यह लग जाएगा

अपनोंजैसा अपना कभी नहीं मिलता है

चिट्ठी

Posted in Uncategorized on अगस्त 12, 2011 by paawas

चिट्ठी कोई
बहुत दिनों से
पेंडिंग ट्रे में पड़ी हुई थी
किसी अकेले प्लेटफार्म पै
स्पेशल ट्रेन पड़ी हो जैसे

अनदेखी अनचाही लावारिस जैसी वो
तरह तरह से सबको पास बुलाया करती
मौसम बना कतारें आकार चले गए थे
एक नज़र भी नहीं किसी ने देखा उसको

पलकों पै आंसू बह बह के सूख गए थे
उधड़े मैले कपडे चिथड़ों से लगते थे

थक कर खुद से कुछ औरों से आखिर उसने
राह ख़ुदकुशी की चुन ली थी अपनी खातिर

जिस्म हुआ बेजान मगर
सिसकियाँ सुनाई
देंगी बरसों तक उस की अब

पेंडिंग ट्रे में पड़ी हुई थी क्या करती वो