जून, 2011 के लिए पुरालेख

वहाँ

Posted in Uncategorized on जून 30, 2011 by paawas


हमने देखा है
वहाँ एक सड़क पसरी है
और फैला सा वही पेड़ वहाँ चस्पां है
फैली फैली सी डालियों के घने पत्ते हैं
एक वीरान सी छाया उतर आती है वहाँ
और बस घेरती रहती है सभी कुछ अक्सर
पेड़ के नीचे ही है बस उसी छाया से घिरा
उजड़ा उजड़ा सा हुआ और खाली खाली सा
जाना पहचाना वही बेंच गडा सा अब भी
रात को जब कभी बारिश वहाँ हों जाती है
एक आवाज़ सुबकती सी उतर आती है
याद करता है कोई बीते हुए लम्हों को
तुम कभी जाना अकेले में देखना उसको
सारे अफ़साने वहाँ बिखरे हैं जिंदा हैं अभी

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पावस के दिन

Posted in Uncategorized on जून 27, 2011 by paawas

पावस के दिन
भीगे भीगे

मन पागल
एकाकी रोये
आ गए साजन
आज सभी के

पावस के दिन
भीगे भीगे

साथी सारे
छोड़ गए हैं
मन व्याकुल
रोये है
निशि दिन
इंतज़ार सब
फीके फीके

पावस के दिन
भीगे भीगे

थक कर हार
गईं है ऑंखें
हाथ पकड़
अब आ ले
जाओ
रिश्ते झूठे
यहाँ सभी के

पावस के दिन
भीगे भीगे  
   

तेरे दर्द

Posted in Uncategorized on जून 26, 2011 by paawas

तेरे दर्द

बड़े ही गहरे

तेरे दर्दों में

दिखते हैं

तूफ़ान

ठहरे ठहरे

हटा हवाएं
जाना इनको
हटा घटाएं
जाना इनको

इश्क की पलकों
पर तुलते हैं
मजबूरी के पहरे

तेरे दर्द
बड़े ही गहरे

प्यार के नगमे
प्यार की बातें
आँखें आज चुराएं
देर देर तक
भरे सिसिकियाँ
बिखर बिखर
गिर जाएँ

अंगारों लपटों में
झुलसे
सपने सभी सुनहरे  

तेरे दर्द
बड़े ही गहरे


उम्मीदों की
जवां ठह्नियाँ
सजीं रचायें
जौहर

प्यार में डूबे
भटक रहें है
तूफ़ान कितने

दर दर

नहीं कहीं
कोई सुनता है
रिश्ते 
सारे बहरे

तेरे दर्द
बड़े ही गहरे     

लफ्ज़ लंगड़े

Posted in Uncategorized on जून 16, 2011 by paawas

हम ने पहले भी कहा था


कागजों की कतरनों पे
लफ्ज़ लंगड़े हों रहे हैं

और फिर ये भी कहा था

आओ खोजे फिर से उन बीते दिनों को
और खोले एक झरोखा ,
ख्वाब ले आकार नाचें
सामने पलकों के भीतर

और ये भी तो कहा था

आओ चुन ले
फिर नई तस्वीएर कोई
और फिर उसको निखारें  
काट करके पोस्ट कर दें
पास में ही मन की उस आवाज़ के –
लफ्ज़ जिसके लग रहे लंगड़े हमे हैं

लफ्ज़ पाएं शक्ल और चलने लगें सब
और तस्वीरों को भी मिल जाए इक आवाज़ सुन्दर

 क्या करें हम
कोई भी सुनता नहीं है इक हमारी

रात जागती ही रही

Posted in Uncategorized on जून 12, 2011 by paawas

 
 
 
तेरी बातों के हाथ थाम मोड पार किये
और जो थक गए तो बैठ गए बेंचों पर
छाँव पेड़ों की तनी छतरी कोई हों जैसे
ख्वाब आँखों में लिए रात जागती ही रही
गहने सपनों के पहन जैसे हों दुल्हन कोई

मन तडपता सा रहा और भटकता सा रहा
हाथ में आ के सिरे दूर सरकते ही रहे
मुट्ठी भर बादलों ने चाँद को परदे में ढका
और जादू से कई इंतज़ार में भटके

Posted in Uncategorized on जून 10, 2011 by paawas

बहती नदियों सी पुरानी हों जाओ,
आज तुम मेरी कहानी हों जाओ
घिर के उठ्ठो घटाओं सी ऊपर ,
तैरता तैरता पानी हों जाओ
और जो रोके से ना रुक पाए ,
ऐसी पागल सी रवानी हों जाओ

आके इक बार जो ना लौटे कभी
मेरी बातों की जवानी हों जाओ

वो जो छुप के है बसा ज़र्रों में
तुम वही नूरे रूहानी हों जाओ

तुहारा ख्याल

Posted in Uncategorized on जून 7, 2011 by paawas

कुछ दिल भी धड़कता है कुछ दर्द भी होता है
उम्मीद भरे दिल की कुछ बात ही ऐसी है

आना तो चले आना आ कर के ना अब जाना
दो दिन की मोह्ल्तों की सौगात ही ऐसी है

तुम भूल चुके बातें तुम भूल चुके वादे
भूले हुए किस्सों की बरात ही ऐसी है

आओ तो तुम्हें देखें जाओ तू तुम्हें ढूँढें
इन बेकरारियों की हर रात ही ऐसी है


इन्हीं बेकरारियों ने मगरूर कर दिया था
ये दिल तुम्हारा वरना सोने का एक दिल था

ज़रा पाँव धीरे रखना ज़रा तुम संभल के रहना
बड़ी देर में है सोया कहीं दिल धड़क ना जाए

 जो तुम चुप चुप बैठे हों रूठे हों आहें भरते हों
आँख बचा दिल ही दिल में बस मुझ से ही बातें करते हों