नवम्बर, 2010 के लिए पुरालेख

जाड़ों के मौसम

Posted in Uncategorized on नवम्बर 26, 2010 by paawas

जाड़ों के मौसम आ

सुनसान राहों पर

खूब बात करते हैं

जाड़ों के मौसम में

भीगे हुए दिल

खुद से ही डरते हैं

जाड़ों के मौसम में

डूबा डूबा सा दिल

सिहर सिहर जाता है

जाड़ों के मौसम में

खोया हुआ दिल

गीत कोई गाता है

जाड़ों के मौसम में

सड़कों चौराहों पर

रिश्ते मंडराते हैं

जाड़ों के मौसम में

झीलों के पानी पे

बादल घिर आते हैं

जाड़ों के मौसम में

जलते अलावों से

आँखें भर आती हैं

जाड़ों के मौसम में

खिलती दोपहरों में

नींद बहुत आती है

जाड़ों के मौसम में

बिसरी आवाजें बन

सबको भरमाते हो

जाड़ों के मौसम में

खिंचती सी रातों में

याद बहुत आते हो

तुम्हारे लिए

Posted in Uncategorized on नवम्बर 10, 2010 by paawas

खुशबुएँ कैद से निकल भागीं
फूल भी चौंक चौंक से उठे

बात कलियों से तेरी की मैंने

उठके इस चाँद को देखो तो ज़रा
तैरता तैरता  समंदर पर

झट से  छुप जाता है मेरे दिल में 

वक्त को मुठियों में भर भर के
ढेरियाँ सी लगाती जाती हो

भीड़ सदियों कि बनती जाती है

उदासियां

Posted in Uncategorized on नवम्बर 8, 2010 by paawas

कुछ ही दिन पहले तो
सपनों की फसलों के
पकने के मौसम थे

कुछ दिन ही पहले तो
मन के हर कोने में
उम्मीदें गाती थीं

कुछ दिन ही पहले तो
बरसाती रातों में
मेघों के मेले थे

बदलें हैं मौसम सब

परबत के ओठों को जैसे सी डाला हो
बाँध कर के रखा हो जैसे हवाओं को
पत्थरों के बुत सी ये कायनात सारी है

अब इतनी चुप्पी है
अब एक ख़ामोशी है
सागर ख़ामोशी में
गुम सुम से बैठें हैं
गहरे अंधेरों की 
परतों में लिपटे ये 
सिसकियों के मेले हैं 

सांस लेते रहना ही सिर्फ एक हरकत है 
सबकुछ मुरझाया है बेजान बेनूर है 

अब ऐसा लगता है 

लंबी सजाओं का 
लंबा सा सिलसिला 
न तो जीने देगा 
न ही मरने देगा 

अब ऐसा लगता है 

———————
बातें जो कही नहीं 
———————

जादूगरनी

Posted in Uncategorized on नवम्बर 6, 2010 by paawas

छोटी छोटी इन घड़ियों को
सुखों से तुम भर देती हो 
फटी पुरानी सी यादों को
नया नकोरा कर देती हो

तुम तो इक जादूगरनी हो

बात करो

Posted in Uncategorized on नवम्बर 4, 2010 by paawas

जो मुझ से तुम
बात करो तो
मैं भी बोलूँ

तुम तो रूठी रूठी सी हो
थकी थकी हो सोई सी हो

पास खड़ा हो देख देख कर
तुमको
मैं कुछ सोच रहा हूँ

वक्त की टहनी से कुछ
भीगे भीगे मौसम
धूप के टुकड़े
कुछ काले काले से बादल
तारों की बातें कुछ
और हवाएं ठंडी
और झूमते गाते जंगल
और बर्फ के ताज़ा गोले

साथ ही चमक उन किरणों की
जो बर्फों की चोटी को नहला जाती हैं

सब कुछ डालूँ इक बर्तन में

खूब हिलाऊँ और उडेलू तुम सोई पर

चौंक चौंक जब उठो
कहूँ मैं

उठ जागो  और पास बैठ कर
बात करो अब

_______________
बातें जो कही नहीं
_________________

तारे जैसा मैं टूटा था…

Posted in Uncategorized on नवम्बर 4, 2010 by paawas

तारे जैसा मैं टूटा था
सबने देख देख कर मुझको
कुछ माँगा था

तुमने  भी तो कुछ माँगा था
कुछ चाहा था
आज तलक जो नहीं पता है
कुछ माँगा था छुपा छुपा सा

जो चाहा था जो माँगा था अगर मिला हो
मुझे बताना

खुद को पूनः सहेजूँ  और सजाऊँ फिर से
और पुनःमैं नभ में टूटू

फिर से तुम कुछ खुशियाँ मांगो
हंसी खुशी से घिरी रहो तुम

बार बार मैं टूटू सिर्फ तुम्हारी खातिर

——————————–
बातें सिर्फ तुम्हारी खातिर
——————————–

तुम

Posted in Uncategorized on नवम्बर 3, 2010 by paawas

तुम        तुम           तुम        तुम

मेरी       तो            बस एक तुम
सोचों की वादी में
बातों की डलिया है
बातों की डलिया में तुम

परियों की शहज़ादी तुम
पूरी कभी आधी तुम

सरिता सी बल खाती तुम
बादल सी छा जाती तुम

सागर की लहरों में तुम
तपती दोपहरों में तुम

मरुथल की वीरानी तुम
मेरी परेशानी तुम

जंगल बियाबान तुम
खोये से अरमान तुम

शिखरों की घंटी हो तुम
बबली और बंटी हो तुम

तारों की छाया हो तुम
भटकती माया हो तुम

वर्षा की रिमझिम हो तुम
खुल जाए सिम सिम वो तुम

गर्मी की रातें हो तुम
बातें ही बातें हो तुम

भटकाते रस्ते हो तुम
कापी कलम बस्ते तुम

सड़कों पे टीले हो
पल सूखे पीले हो तुम

बचपन की यादें हो तुम
भूले हुए वादे तुम

ठंडी हवाओं में तुम
गुम सुम हवाओं में तुम

जन्मों की प्यासी हो तुम
गहरी  उदासी हो तुम

मस्जिद की आजान तुम
खोई सी पहचान तुम

नानक की बानी हो तुम
सदियों पुराणी हो तुम

हेमेस की पूजा हो तुम
जिस सा नहीं दूजा तुम

यादों का संदूक तुम
कोयल की एक कूक तुम

सपनों की भाषा हो तुम
बरसों की अभिलाषा तुम

आंसू की धारा हो तुम
मन जिस से हरा वो तुम

चुप्पियाँ सन्नाटे तुम
रो रो जो दिन काटे तुम

दर्दों का पीना हो तुम
खामोश जीना हो तुम

बचपन का सपना हो तुम
खोया कोई अपना तुम

सावन का झूला हो तुम
मन जिस को भूला हो तुम

बाहों के घेरे हो तुम
खिलते सबेरे हो तुम

मंदिर की झंडी हो तुम
बर्फों सी ठंडी हो तुम

मरती हुई आस तुम
मेरी हर एक प्यास तुम

तुम से ही जीवन है
मर जाने की धुन है
बुझती सी साँसों में तुम  

मेरी तो बस एक तुम
तुम    तुम     तुम   तुम
बस मेरी तो एक तुम

———————-
बातें जो कही नहीं
———————-