अक्टूबर, 2010 के लिए पुरालेख

किसे पता था

Posted in Uncategorized on अक्टूबर 24, 2010 by paawas

फूल मुंडेरों पर ऐसे आ खिल उठेंगे,
आंधी के बादल नभ पर यूँ मंडराएंगे
तारों की बारात द्वार पर सो जायेगी
बात अनकही सारे जग की हो जाएगी
                                    किसे पता था
अनजाने में ख्वाबों का एक बीज उठाकर
अंतर की उजड़ी मिटटी में जब बोया था
नहीं पता था
जंगल से उग, घेर घेर मन
चिल्लाएँगे
नहीं पता था
पलकों की कोरों में उग आयेंगे
भीगे भीगे मौसम,
खुशबू जिनकी 
बरसों बरसों भरमायेगी
नहीं पता था 
रिश्ते नाते, दुनियादारी ऊँच नीच की,
सपनों के कपडे पहनेगी, 
ख्वाबों के खामोश परिंदे 
जीवन भर यूं भटकायेंगे 
नहीं पता था 
सोचों की भीड़ों में हो ग़ुम, 
एक  सिलसिला सा बन कर तुम रह जाओगे
नहीं पता था  दूर कहीं जा सीमाओं से
घने अंधेरों में तुम ऐसे 
खो जाओगे
                                      किसे पता था


तुम बिन

Posted in Uncategorized on अक्टूबर 11, 2010 by paawas

…और हम लौट आये थे अपने शहर में…पच्चीस बरस बीत चुके थे और हम सहमे सहमे डरे डरे से थे.. हवाओं में परिचित खुशबुएँ   थीं.. इठलाते झोंके हमें छूते और सहम जाते.

हम सड़कों को, मोड़ों को, कोनों को, दरख्तों को नज़रों से छू रहे थे. तुम्हें ढूँढ रहे थे… और तुम नहीं थीं. तुम्हारा न होना हमें बार छू जाता. पर तुम सचमुच नहीं थीं, कहीं भी नहीं थीं…!

अनदेखे कचरेदानों में बीते दिनों की यादें बूढी हुई  ऊंघ रहीं थीं. निशब्द…

एक सुनसान सी वीरानी थी… साँय साँय करते सन्नाटे थे …

‘अब कुछ नहीं हो सकता, कुछ  भी नहीं हो सकता… ‘ हम सोच रहे थे…

नवम्बर और दिसंबर के महीने बीत रहे थे पर शायद इन महीनो में एक भी दिन नहीं था, ख़ाली डिब्बों से हो गए थे ये महीने…

उम्मीदों की लकीरें, न उम्मीदियों के सिलसिले बन गयीं थीं
भरी भरी चमकीली आंखें उदास और डरी डरी थीं.
कहीं भीड़ों में अकेला कोई तो कहीं अकेलों की भीड़
कहीं चीड़ों पे चांदनी तो कहीं चांदनी में अकेला चीड
कहीं अशोक की कतारें तो कहीं कतारों में अशोक.

डूबती उम्मीदों की किश्तियाँ हवाओं में तैर रहीं थीं
देख रहे थे
सोच रहे थे
 पी रहे थे  याद कर थे, सबको, खुद को
दरवाज़े बंद थे और सरगोशियों का जमघट था
लम्सों के मौसम
और उन मौसमों में
…बूँद बूँद तपता, पिघलता, मोम सा वकुत…
‘कहाँ हो…कहाँ हो…कहाँ हो तुम…..’
कातर पुकार….
और छू छू जाते… बहते …मौन …,सन्नाटे….

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बातें जो कही नहीं
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तुम से बात करून में

Posted in Uncategorized on अक्टूबर 8, 2010 by paawas

आओ
तुम से बात करून में

बंद करूं पलकें मन के कमरों में झांकूं
घिर घिर कर मेघों सा बरसूं सदा निरंतर
और हवा सा घेरूँ तुमको

दौड़ दौड़ कर सीमाएं सदियों की फांदूं
सभी पुराने जन्मों की यादों को छानूं
और लौट पल भर में आऊँ

हाथ पकड़ कर सड़क किनारे तुम्हें बैठाऊं
तब  तुमसे बस
लम्बी लम्बी भीगी भीगी बात करूं में.

धुप कुनकुनी हो जाड़ों की
ओद्धाऊँ तुमको जैसे तुम शाल लपेटो
बंद तुम्हारी पलकों के पीछे हो दुनिया
ख्वाबों की उम्मीदों की उस ख़ामोशी की
गुन गुन करती जो मन को घेरे रहती है

और हज़ारों गीतों की रूहों को पकडूँ
रंग भरूँ वैसे ही जैसे तुम भरती हो
और बिखेरूं सब मन के कोने कोने में

आँख मूँद मैं  तुमको देखूं
सुख के लम्हों को पहनाऊँ
रुक रुक कर के ठहर ठहर के बात करूं मैं.

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बातें जो कही नहीं
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