मई, 2010 के लिए पुरालेख

आ जाओ

Posted in Uncategorized on मई 5, 2010 by paawas

इंतजार जन्मों के हो बेजान पड़े हैं,

नज़रें टिकी हुई हैं मन के आसमान पर,

उम्मीदें आशाएं हारी ऊंघ रही हैं

अब जाओ देखें नयन तुम्हारा चेहरा

सदियों की पीडाएं रस्ते भूल चुकी हैं,

मेरे इस अन्तर के सूने से खंडहर में,

गूँज पुकारों की अपना सर पटक पटक कर, हारी तुमसे

मौन हुआ में कायनात में भटक रहा हूँ

तुम आओ तो खोकर तुम में पाऊँ में विश्राम

Baatein Jo Kahi Nahin

Posted in Uncategorized on मई 5, 2010 by paawas

यादों के पहरे
लगा दिए अन्तर पे
क्यों इतने गहरे ।

…उन बड़ी बड़ी खिड़कियों से सूखे पीले पत्तो को अनवरत गिरते देखना बहुत अच्छा लगता था। अक्सर पहली या दूसरी मंजिल के किसी अकेले कमरे में चले जाते और देखते रहते थे पत्तों को गिरते ।सब खामोश सा बना रहता था और वो पत्ते निर्बाध बरसते रहते। कहीं दूर से आवाज़ आती रहती ‘याद आए की न आए तुमरी’। उन पत्तों को देखते बरसते रहते हम भी।मन बुझा बुझा सा, मरा मरा सा बना रहता। असहाय होने का एहसास सूखी आंखों में घिरते हमारे सहमे से वजूद से दो आंसू निचोड़ लाता और खड़े रहते हम मौन और स्तब्ध । हवा के झोंके पत्तों की ढेरियों को बिखेरते रहते, और समय का कुछ ख्याल न रहता।
…..और तभी कैसे अचानक तुम हमें ढूँढ निकालती। कब तुम्हारे हाथ हमारे ठंडे निष्क्रिय हाथों को ढक लेते …तुम्हारी ठोडी हमारे माथे पे टिकती और आँखें टिक जातीं गिरते पत्तों परकुछ पता न चलता।
किसी क्षितिज के परे से आता तुम्हारा स्वर; ‘क्यों सहते हो सब …क्यों नहीं तोड़ते यातनाओं की कैद और बाहर आ जाते … मुझे क्यों नहीं करने देते कुछ … क्यों नहीं देते मौका की ले जाऊं दूर तुम्हें इस सब से …घेर लूँ , समेट लूँ, लुको लूँ तुम्हें अपने भीतर … मर जाऊंगी… सच, मर जाऊंगी मैं…’ तुम कहती रहतीं । होश आता जब तुम्हारी आँख से टपके आंसू आ गिरते मेरे गालों पे।
‘… इतना उदास रहते हो … कभी न सोचा था …जानती हूँ तुम्हें बचपन से … तुम्हारी पहली कचे दूध सी मासूम यादों से … मासूमियों की इब्तदाओं से। काश मैं रह पाती साथ तुम्हारे … मर कर भी यूँ उदास न होने देती … हाँ मर कर भी… मेरे चेहरे को हथेलियों में ले तुम देखती रहतीं दूर, गहरे मेरी आंखों में… और कहती रहतीं …कहती रहतीं ….. ।
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बातें जो कहीं नहीं
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