मार्च, 2010 के लिए पुरालेख

Posted in Uncategorized on मार्च 27, 2010 by paawas

गर्मी

ए सी महंगा, बिजली महंगी,
पंखे गर्मी फेहराते हैं,
हाथ की पंखी झलने की ताकत है किसमे,

मिले कहीं जो फैला पीपल,
छाँव ओढ़कर के पत्तों की,
मटके के पानी से चेहरे को धोकर हम,
खात पे लेटें,
और
बेखबर हो, सो जाएँ।

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बातों के गुलमोहर
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Posted in Uncategorized on मार्च 25, 2010 by paawas

गर्मी

दर्द की गठरियां उठा सर पे,
साथ खामोश मेरे चलते हैं,
लम्बे लम्बे से सुरमई साए।

दौड़ती नाचती है धूल सनी,
एक छोटी सी बौनी सी आंधी,
सूखे पत्तों के पर उगती है

गर्म होती है दोपहर कितनी
आँख चौंधिया के बंद करती है,
बेरहम धुप जेठ के दिन की।

जो जगह हो तो अपने आँगन में
पीली पीली निम्बोलियों वाला,
ठंडी छाया का नीम लगवा लो।

कौन कहता है दिन हैं गर्मी के
देख सको तो देख लो चेहरा
गुस्सा सूरज का है अगर मानो।

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एक अंतराल के बाद, वही दिन
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