अगस्त, 2009 के लिए पुरालेख

एक चित्र

Posted in Uncategorized on अगस्त 30, 2009 by paawas

हाँ
इन्हीं गहरे घने कोहरों की परतों में कहीं,
मेरे सपने हो खड़े बात किया करते हैं
जैसे मुक्कड़ पे किसी चाय की रेहडी के करीब
अपने में खोये हुए भूले हुए से ख़ुद को
चाय के चुस्कियां लें बात करे लोग कई।

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बातें जो कही नहीं
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शोर मचाया करते थे

Posted in Uncategorized on अगस्त 28, 2009 by paawas

दूर कड़कती बिजली को सुन जब डर जाया करते थे,
खेल छोड़ कर सहमे बच्चे घर आजाया जरते थे।
कितने जाडे कितने तूफ़ान गुज़र गए उन मोडों से,
पागल से होकर सब तुमको जहाँ बुलाया करते थे।
बूढी आँखें खामोशी में जो दोहराया करती थीं,
सुन कर चाँद सवाल हमेशा सर खुजलाया करते थे।
अधजागी सी अधसोई सी आंखों में जो बीत गईं,
उन रातों के सारे किस्से वो दोहराया करते थे।
उम्रों की धूपों में पक कर और अलग हो पेड़ों से,
सूखे पत्ते जब गिरते थे शोर मचाया करते थे।

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बीते दिन
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तुम्हारी बात

Posted in Uncategorized on अगस्त 26, 2009 by paawas


बंद आँखें कर जिसे तुम उम्र भर चाहा किए,
वो तुम्हारे ही लिए था वो तुम्हारा ही रहा।
सूरजों की रौशनी गुल हो गई सब थम गया,
एक दरिया चांदनी का साथ में चलता रहा।
और जब खामोश होकर अपनी नज़रें फेर लीं,
थरथराया दिल रगों में खून जमता सा लगा।
ज़हन पर छाये अंधेरे और सन्नाटे मेरे,
कांपता सारा ज़माना देर तक सुनता रहा।
तुम जिसे हैरान होकर दूर तक देखा किए,
वोह महज़ इक अक्स था बुझता हुआ जलता हुआ।

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बातें जो कही नहीं
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किश्तियाँ हो जाएंगी

Posted in Uncategorized on अगस्त 25, 2009 by paawas

जब ख्यालों की उडाने आसमान छू जाएँगी,
दिल पे छाई चुप्पियाँ चिंगारियां हो जायेंगी।
पहरे यादों पे लगे जब टूट जायेंगे सभी,
इतनी सारी खुशबुएँ ये तितलियाँ हो जायेंगी।
तुम नहीं आए तुम्हारे भीगे भीगे इंतज़ार,
चाहतें नाकामियों की दास्ताँ हो जायेंगी।
तुम कहो तो में छुपा लूँ तुमको अपनी रूह में,
लाख आँखें दुश्मनों की ढूँढती रह जायेंगी।
बाद मेरे तुम सुनोगे मेरी इस आवाज़ को,
मेरी बातें तैरती सी किश्तियाँ हो जायेंगी।

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बातें जो कही नहीं
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तब और अब

Posted in Uncategorized on अगस्त 24, 2009 by paawas

बात पुरानी, बात नई भी,
बात यही जो याद रही है…

तब हम सब छोटे छोटे थे,
साथ बैठते, साथ खेलते,
पढ़ते लिखते साथ नहाते,
एक दूसरे के गालों पर
साबुन की टिकिया घिसते थे।
लड़ना लड़ कर रूठा करना
और ज़रा में फिर मिल जाना
बचपन हम तीनों का था वो।

अलग हुऐ बरसों बीते अब।

जैसे सब कुछ उलट गया है
अलग अलग सोचें हैं सबकी
सपने, दर्द, अलग उम्मीदें,
लफ्ज़ लहजा सभी जुदा हैं,

फूलों के चेहरे हम सबके
बम के गोले से लगते हैं,
रिश्तों में पत्थर सी सख्ती…

एक दूसरे के चेहरे को
हाथ लगाते डर लगता है,
रिश्तों की वो सारी बातें
डरी हुई हैं, सहम गईं हैं
दिल जैसे अब टूट गए हैं।

कहीं अचानक जो छू लोगे,
चेहरे बम से फट जायेंगे,
सारे रिश्ते मर जायेंगे
ख़्वाबों का खून हो जाएगा।

अच्छा तो अब यह ही होगा,
तुम अपना बम सा चेहरा ले
दूर कहीं पे जा कर बैठो
और बर्फों से ठंडे हो kar
तुम भी दूर कहीं छुप जाओ।

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बातें जो कहीं नहीं
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छुअन साथ रहे

Posted in Uncategorized on अगस्त 22, 2009 by paawas

और फ़िर जब कभी आते आते
मेरी आवाज़ गुम सी होने लगे
जम रहे लम्हे पथरों की तरह
तोड़ने दम मेरे एहसास लगें…

घुप अंधेरे में रौशनी बन के,
तेरी नज़रें हों, साँस हो तेरी,
तेरे हाथों की छुअन साथ रहे,
और जज़्बात सरे खिल जायें…

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बातें जो कही नहीं
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कैसा लगा

Posted in Uncategorized on अगस्त 20, 2009 by paawas

शहर में अपने फ़िर से आकर कैसा लगा,
मठरी शक्कर मिसरी खाकर कैसा लगा।
ठंडी ठंडी खुश्क हवा हो मस्त चली,
बालों को बिखरा कर बोलो कैसा लगा।
बूढी आँखें खामोशी रिसते रिश्ते,
यादों को दुलराकर तुमको कैसा लगा।
जिन ख्वाबों को नज़र बचा कर छोड़ दिया,
आज उन्हीं से हाथ मिलकर कैसा लगा।
चदते सूरज की शनील सी धूपों में,
दही दूध से कहो नहाकर कैसा लगा।

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बातें जो कही नहीं
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