जुलाई, 2009 के लिए पुरालेख

Posted in Uncategorized on जुलाई 29, 2009 by paawas

यादों के पहरे
लगा दिए अन्तर पे
क्यों इतने गहरे ।

…उन बड़ी बड़ी खिड़कियों से सूखे पीले पत्तो को अनवरत गिरते देखना बहुत अच्छा लगता था। अक्सर पहली या दूसरी मंजिल के किसी अकेले कमरे में और देखते रहते पत्तों को … सब खामोश सा बना रहता था और वो पत्ते निर्बाध बरसते रहते। कहीं दूर से आवाज़ आती रहती ‘याद आए की न आए तुमरी’। उन पत्तों को देखते हम भी बरसते रहते शायद । मन बुझा, बुझा सा, मरा मरा सा बना रहता। असहाय होने का एहसास सूखी आंखों में घिरते हमारे सहमे से वजूद से दो आंसू निचोड़ लाता और हम खड़े रहते … मौन और स्तब्ध। हवा के झोंके पत्तों की ढेरियों को बिखरते रहते, और समय का कुछ ख्याल न रहता।

…..और तभी कैसे अचानक तुम हमें ढूँढ निकालती। कब तुम्हारे हाथ हमारे ठंडे निष्क्रिय हाथों को ढक लेते …तुम्हारी ठोडी हमारे माथे पे आ टिकती और आँखें टिक जातीं गिरते पत्तों पर … कुछ पता न चलता।

किसी क्षितिज के परे से आता तुम्हारा स्वर; ‘क्यों सहते हो सब …क्यों नहीं तोड़ते यातनाओं की कैद और बाहर आ जाते … मुझे क्यों नहीं करने देते कुछ … क्यों नहीं देते मौका की ले जाऊं दूर तुम्हें इस सब से …घेर लूँ , समेट लूँ, लुको लूँ तुम्हें अपने भीतर … । मर जाऊंगी… सच, मर जाऊंगी मैं…’ तुम कहती रहतीं । होश आता जब तुम्हारी आँख से टपके आंसू आ गिरते मेरे गालों पे।

‘… इतना उदास रहते हो … कभी न सोचा था …जानती हूँ तुम्हें बचपन से … तुम्हारी पहली कचे दूध सी मासूम यादों से … मासूमियों की इब्तदाओं से। काश मैं रह पाती साथ तुम्हारे … मर कर भी यूँ उदास न होने देती … हाँ मर कर भी… मेरे चेहरे को हथेलियों में ले तुम देखती रहतीं दूर, देहरे मेरी आंखों में… और कहती रहतीं …कहती आहार ….. ।
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बातें जो कहीं नहीं
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Gulmohar Ummeedon Ke

Posted in Uncategorized on जुलाई 28, 2009 by paawas

रिश्ते नाते नाज़ुक नाज़ुक उम्मीदें
बनते है, बन कर के सब मिट जाते हैं।
सूरज तो धरती की प्यास बढाता है
प्यास बुझाने सावन के दिन आते हैं।
हाथ थाम कर कौन इन्हें है रोक सका
साथ बिताए लम्हे कट ते जाते हैं।
छोटे छोटे लगें सभी अपनों जैसे
सपने हो कर बड़े सभी बंट जाते हैं।
तेरी मेरी उम्मीदों के गुलमोहर
सड़क किनारे खड़े खड़े मर जाते हैं।
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बातें जो कही नहीं
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Mein Paas Hi Rahoonga

Posted in Uncategorized on जुलाई 27, 2009 by paawas

सो जाऊँगा मैं आखिर
एक मोड़ पर आ कर के
खो जाएँगे ये किस्से
खो जाएंगी ये बातें
खो दोगे मेरा छूना
जाडों की मुलाकातें
सहलाती मेरी नज़रें
जज्बातों की वह खुशबू
दामन में ज़ज्ब आंसू
बहती हवा ये हरसू
इक पल में जा रुकेगा…
पल भर को ही रुकेगा
यादों का हो रहेगा —
भीगी हुई यादों का
बहती हुई यादों का
सूखे हुए पत्तों का
सूने में कसक जैसा…
रूकती कहानियों में
मैं झांकता रहूँगा
आंखों से न दिखूंगा
बातें सभी कहूँगा
महसूस दिल में हूँगा
हो साथ साथ सबके
सब का बना रहूँगा
सब साथ में सहूँगा
मैं पास ही रहूँगा
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बातें जो कही नहीं
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बातें जो कही नहीं

Posted in Uncategorized on जुलाई 24, 2009 by paawas

…नींद खुलते ही घेर लेते हैं इंतजार … जैसे घुमड़ते काले बरसाती मेघ घेरने लगें … रोशनियों पे छाने लगें शाम के साए… भीगे भीगे इंतजार शिथिल और निष्क्रिय सा बना देते हैं ।

आँखें मुंद जाती हैं और आस पड़ोस का शोर दूर सरकने लगता है ।

और फ़िर जैसे अगरबत्ती के सर्पीले धुएँ सी खुशबू उठने लगती है भीतर से … लिहाफों में से झांकते बरसों पुराने चेहरों की, मौसमों की,झूठे वादों की, सड़कों और मोडों की, लम्बी लम्बी बातों कीधूल उड़ाती बसों की,सूनी सूनी उदास आंखों की,विंड स्क्रीन पर अटके सूखे पत्तों की,पहाडों नदियों और सागरों की,सायें सायें करते अकेलेपन की,तड़पते अवसादों ले टूटते दिलों की।
तब उमीदें तुम्हारे आने और दोबारा आने की जगी रहती थीं। तुम आतीं थीं और मन तुम्हें समेटता और लपेट ता रहता था।
अब शायद भीतर ही जगती हो तुम… गूंजती और गुनगुनाती हो, गाती और छा जाती हो। अमूर्त हो गई हो…स्पर्शों की पकड़ से परे…उन्मादों की सीमा से बाहर… मुखर और मौन एक साथ ही। क्या हो गई हो तुम…क्या से क्या हो गई हो; बोलती शिलाओं सी परायी, विलग और दुरूह। हम हैरान हैं…स्तबद्ध और अवाक…

Meri Baatein

Posted in Uncategorized on जुलाई 4, 2009 by paawas

Meri baaton ko suno tum meri baaton ko suno,

Koi kissa koi naghma koi ye nazm naheen,
Meri baatein hain kataarein,chamaktee dhoopon mein,
Bheed mein khoi hueen, soi huee raaton mein,
Timtimaate kisi tare kee tarah door kaheen,
Ghaas kee pattee see larahteen hai hawaaon mein,
Aur oodee see ghataaon kee tarah ghirtee hain.

Meri baton ko suno tum meri baton ko suno