नया साल

Posted in Uncategorized on फ़रवरी 26, 2012 by paawas

हर बर्ष ऐसा ही तो होता …
निर्जीव सा शरीर पड़ा रहता है और आत्मा उससे अलग हो … उसे देखती रहती है …
मुड मुड कर देखती है और फिर चल देती है …
वही आत्मा फिर नए वर्ष में प्रवेश करती है …
नया वर्ष ऐसे ही आता है … पुराना ऐसे ही बीत जाता है …
पुराने पन्ने शिला पुस्तकों से हो जाते हैं … सख्त, कठोर जिसमे बहते से लम्हे विकल कर जाते है …
हम बिछड़े सभी बारी बारी बना रहे थे … चित्रों यानी स्केचिस की एक श्रृंखला … …कुछ स्वाभाविक और कुछ विचित्र सा … एक सूत्र में जोड़ रहे थे … याँ यूं कहे कि ला ला कर पटक रहे थे सब … ऐसे कि उन्हें अपने अनुसार पिरो अपनी कहानी बनाई सके …
और फिर जोड़ कर एक और किस्सा कहा जा सके …
शायद इस उम्मीद से रेशा रेशा उधेड़ डाला था … पुरानी उन के नए स्वेटर बनेंगे …
समय बदल गया है …
कबीर जी की तरह अब कौन बुनता है सब … कहाँ से लाएं कबीर अब …
( कोहरे में उगता दिन )
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पाखी

Posted in Uncategorized on फ़रवरी 26, 2012 by paawas

पाखी ..पाखी … ओ हमारे  पाखी

आपने कहा कुछ लिखेंगी …

हमने सब किताबें … नोट्स … और मन को भी हटा दिया है हर जगह से …

हमने शुक्र गृह से कह दिया है … हमें न बुलाये … हम नहीं आने वाले …

पलकों पे तैरते सपने , उनकी समीक्षाएँ उनकी सदाएं और उनके अर्थ , उन्के रंग … सब हटा किनारे रख दिया है …

आप लिखिए … हम आप को देख रहे हैं … आपको देखते रहेंगे …

अगर लिखे में साँसों की आवश्यकता हो तो हमारी साँसें हाज़िर हैं …

अगर उदासियों के कत्थई रंग चाहेंगी  … तो  हम दे देंगे ..

हमारे पास सलेटी रंग का हल्का , गहरा , भारी भारी सा अकेलापन भी है …

हमने तितलियों को भेजा है …थोडा सा अनुराग इकठ्ठा करने …

बिजली चमक लाएगी और बादल… बौछारें ….

और आप को पता है … चाँद तारे सब इंतज़ार कर रहे हैं … हाल खचाखच भरा है …

हमारा पाखी आज कुछ कहेगा .. पाखी को प्यार

हम

तुम्हारा नाम

Posted in Uncategorized on फ़रवरी 26, 2012 by paawas

कल वहाँ इन्तजार करते हुए एक कागज के टुकड़े पर  तुम्हारा नाम लिखा था ….

फिर सोचते सोचते अनायास ही उसे तहाते हुए एक गोली में बदल डाला था ….

हलके फिरोजी सूट में तुम्हारे दिखने पर उसे पेंट की जेब में रख डाला था … और फिर भूल गये थे …

आज सुबह वह पेंट धुलने को रख दी …

जेब से गोली बना तुम्हारा नाम दोबारा हथेली में आ गया … उसे देर तक देखते रहे …

आपको पता है

आपका नाम हम से बातें किये जा रहा है … कितनी कितनी बातें … कैसी कैसी बातें .. रंग बिरंगी बातें …

Posted in Uncategorized on फ़रवरी 20, 2012 by paawas

 

 

क्षितिज की रेखा पर  छोड़ दिया था तुम्हें उस दिन …

आने को कहा था और यहाँ  भटक गए थे …  तुम वहीं खडी होगी … सब कुछ इंतज़ार के रंग में रंग गया होगा …

क्या ब भी उन्ही कपड़ों में हो … कुछ खाया , पिया … !

हमें पता है तुम्हारी किसी ने सुध नहीं ली होगी … बीते हुओं की कोई सुध नहीं लेता … बीते हुओं के दर्द कैसे होते हैं … ?

और वो जो होते भी नहीं हैं और बीतते भी नहीं हैं , … उनके दर्द कैसे होते हैं … अब  तुम्हारे पास आ तुम जैसे ही  हो जायेंगे फिर से  …

यहाँ तो बिना ठिकाने के लोग प्लास्टिक की खिची रस्सियों से हो जाते है … बिगड़े रूप … बिगड़े आकार …

तेज धूल भरी हवाओं में लावारिस रद्दी कागजों के अनाथ  टुकड़े …

तुम क्या गयीं … हमें किसी ने नहीं संभाला … किसी ने नहीं सहेजा … मतलबी रिश्तों मे लुटते रहे …

विश्वास दिलाते हैं … हम वैसे ही बने रहे जैसा तुमने आखिरी बार देखा था …मन वैसे ही हैं जैसा तुमने बनाया था …

( तुम्हें लिखा एक पुराना खत )

ये दिन

Posted in Uncategorized with tags on फ़रवरी 20, 2012 by paawas

सलेटी सा मैला आकाश धूप की मैल ओढ़ रहा है …
हर रोज इंतज़ार रहता है नीले गहरे आकाश का … मार्च आने को है और फरवरी के दिन सरक नहीं रहे हैं …
दूर क्षितिज के पास मौसम लाइन बना खड़े हैं … किसका इंतज़ार है उन्हें …
फरवरी के ये दिन किसी भी मौसम के नहीं होते … एक उकताहट और उनींदापन … अलसाए बदरंग दिन और उचटती नींद वाली थकाऊ रातें …
कुछ होते होते रह जाता हो जैसे … जैसे बहुत दिनों से चला पत्र रास्तों में खो गया हो … किसी दूसरे का दरवाज़ा खटखटा रहा हो …
मार्च के दिन संवरे संवरे होंगे … गर्द बुलाते से जाड़े हारे हुए से जा रहे होंगे और कुछ गर्म गर्म सा उभरने लगेगा हवाओं में … हल्का  सिकता सा वक्त … ओवन से निकले किसी हाट क्रास बन जैसा …
मार्च यानी दिन जैसे दस बजने को हों … जैसे कोई दूकान के शटर खोल रहा हो … जैसेचाय वाले ने पहली चाय का पानी चढ़ा दिया हो … जैसे उम्मीदों भरे इंतज़ार शुरू हो रहे हों … जैसे भूरे उदास मन ने आँखें खोल ली हों …
जैसे एक बेवजह सी उम्मीद हाथ पकड़ ले …

हमने जाना …

Posted in Uncategorized on जनवरी 23, 2012 by paawas

 

राहों पर रुक रुक रुक कर देखा …

रुक रुक कर कर ही सुनी तुम्हारी सभी आवाजें …

रुक रुक कर ढूँढा पाया जाना है तुझको …

रुक रुक कर ऐसे ही बस इतना जाना है …

 तुझ से होना तेरा होना बस हो जाना ही जीना है

निजी …

Posted in Uncategorized on जनवरी 23, 2012 by paawas

‘… आम की डाल पर डला झूला धीरे धीरे हिल रहा है अब … कुछ पल  पहले ही तो आप झूल रहे थे और देख रहे थे हम … आप किसी के साथ चले गए तो बच गयी है एक कहानी … झूलती सी … इस हवा में … बारिशों में भीगती यह कहानी सदियों तक बनी रहेगी … डोलती रहेगी … आप से लंबी हैं आप की कहानियां …’

आप से शुरू हो कर आप तक ही पहुंचें जो … ऐसी ही कुछ  बातें …

सूरज का हाथ थामे

थीं  गा रही हवाएं

पीछे ही आ रही थीं

काली भरी घटाएं

कुछ बात ही ऐसी थी

कुछ ऐसा ही हुआ था

बहते हुए वो आंसू

पलकों में लौट आये

आँखें तुम्हारी फिर से

तब बंद हो रही थीं

वो मौत का तबस्सुम

तुम काश देख पाते

बातें वो सुरमई सी

किस्से वो पीले पीले

हम से ही सब शुरू हो

हम तक ही लौटते हैं

कुछ देर को नज़ारे

हैरान हो गए थे

कुछ देर तक तुम्हारी

आवाज़ खो गयी थी

इक बार चलते चलते

जो मुड के देख लेते

वो सूखते से लम्हे

शायद संवरने लगते

बीती हुई बातों की

इतनी सी कहानी है

पलकों में लरजता सा

सूखा हुआ पानी है

बौछार पड गयी थी

लिखे हुए किस्सों पर

कुछ रंग धुल गए थे

आवाज़ रो रही थी

जितने भी दर्द आये

जैसे भी दर्द आये

एक वो पुराना चेहरा

दिखता रहा हमेशा